"शादी लायक बेटी की माँ के मन की उलझन"


नन्ही सी गुड़िया जब बचपन का आँगन छोड़ कर जवानी की दहलीज़ पर आकर खड़ी होती है तब हर संघर्ष से जूझती एक माँ के लिए इस बात से जूझना सबसे कठिन काम होता है। बेटी शादी के लायक होते ही सैंकड़ों सवाल मुँह खोले खड़े रह जाते है। रातों की नींद और मन का सुकून खो जाता है। माँ बाप के जिगर का टुकड़ा होती है बेटीयाँ दिल छलनी और मन तार-तार हो जाता है जब बेटी की बिदाई का खयाल आता है।

जो सक्षम है उनके लिए सबसे बड़ी पैसों की मुश्किल हल हो जाती है, पर मध्यम वर्गीय परिवार में दो सिरे जहाँ मुश्किल से जुड़ते हो वहाँ बेटी की शादी में दहेज के लिए पाई-पाई जोड़ना ज़िंदगी का सबसे कठिन काम होता है। घर कि जिम्मेदारीयां तो अलग से होती ही है ऐसे में समाज का हर नागरिक स्वैच्छिक रुप से दहेज प्रथा को दमन करें तो हर माँ बाप की आधी चिंता दूर हो जाए। शादी जैसे प्रसंग के लिए जुगाड़ एक माँ के लिए चुनौती के बराबर ही होता है। 

और सबसे बड़ी चिंता नाज़ों से लाड़, चाव में पली बेटी को पति कैसा मिलेगा, ससुराल कैसा मिलेगा, ससुराल वालों के स्वभाव कैसे होंगे, वहाँ एडजस्ट कर पाएगी की नहीं वगैरह। 

और खुद बिटिया भी शादी को लेकर अंदर से डरी सहमी होती है उसे संभालना भी एक माँ के लिए मुश्किल काम होता है। और मुद्दे में सबसे अहम मुद्दा समाज का, लड़की अठारह, बीस साल की हुई नहीं कि सवालों का मजमा खड़ा कर देते है। कहीं लड़का देखा, कब कर रहे हो शादी, अभी तक कोई देखा ही नहीं ? हमारी लाड़ो को तो 21 की होते ही हमने विदा कर दिया था, सोचो कुछ सोचो फिर अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाएंगे वगैरह। और अगर बेटी पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होने के बाद शादी करना चाहती है तो आराम से पच्चीस की तो हो ही जाएगी ऐसे में तो पास पडोस और रिश्तेदारो की नींद उड़ जाती है, बेटी पच्चीस की हुई कैसे माँ बाप है, नींद कैसे आती होगी, कहाँ ढूँढने जाएंगे वगैरह। ऐसे में एक माँ की हालत ख़स्ता हो जाती है। 

उपर से एक चिंता ओर ज़माना भी तो खराब है जवान बेटी के पैर फिसलते देर नहीं लगती, ऐसे वैसे लड़के की चुंगल में फंस गई तो ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है। जब तक शादी नहीं हो जाती जवान बेटी सोने चाँदी से लबालब भरी तिजोरी के बराबर होती है, जिसकी रखवाली करते माँ बाप की नींद उड़ जाती है। 

सच पूछो तो कुछ लोगों के लिए इन्हीं कारणों कि वजह से बेटी एक बोझ के समान बन जाती है। खुद से ज़्यादा समाज को जब बेटी की चिंता सताने लगती है तब मानसिक तौर पर माँ बाप भी कमज़ोर पड़ जाते है। और सबसे अहम कड़वी पर सच्ची बात, अगर बेटी दिखने में सुंदर है तो आधी चिंता खत्म हो जाती है पर रंग साँवला या दिखने में नार्मल या थोड़ी कमतर है तो एक बड़ी समस्या कहलाती है। आज हर किसीको बहू खूबसूरत चाहिए बेटा भले दिखने में उल्लू जैसा हो ऐसी बहुत सारी बातें एक जवान और शादी के लायक बेटी की माँ से उसका सुकून छीन लेती है। बेटी बोझ नहीं बेटी सहारा होती है, पढ़ा लिखा कर अच्छे संस्कारों से सिंचकर बेटी को अपने पैरों पर खड़ा करने के बाद ही शादी का सोचें। चार लोगों की बातों में आकर ना खुद चिंतित हो, ना बेटी को कोई टेंशन दो हर बात समय पर छोड़ दो।   

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु