पक्षकार कोर्टफीस वापस लेने के हकदार-अगर अदालती हस्तक्षेप के बिना पक्षकारों की विवाद निपटाने में सहमति-सुप्रीम कोर्ट का एतिहासिक फैसला

पक्षकारों द्वारा निजी तौर पर अपने विवादों का निपटारा करके खुद के और न्यायालयों के समय और संसाधनों को बचाना जरूरी - एड किशन भावनानी

गोंदिया - भारतीय न्यायिक प्रणाली में पक्षकारों को अनेक विकल्प और हर स्तर के बाद अपील का अवसर न्यायिक व्यवस्था का एक खूबसूरत पहलू है। न्यायिक प्रणाली में सबसे खूबसूरत पहलू सिविल प्रक्रिया संहिता, १९०८ (द कोड ऑफ सिविल प्रोसिजर,1908) भारत का सिविल प्रक्रिया सम्बन्धी कानून है। यह पहली बार १८५९ में लागू हुआ था। इसे व्यवहार प्रक्रिया संहिता भी कहते हैं, की धारा 89, जिसमें पक्षकारों को अदालती हस्तक्षेप के आधार पर आपसी में समझौता करने का एक अवसर प्रदान किया जाता है और दोनों पक्षों के विचार सुनकर, समझौता करवाया जाता है, जिसमें पक्षकारों, न्यायालयों के समय व संसाधनों की बचत होती है। सीपीसी में उल्लेखित है कि समझौता अनेक प्रकार से हो सकता है। जैसे मध्यस्थम, सुलह, लोक अदालतों के माध्यम से, बीच-बचाव, इत्यादि प्रकार से समझौते का प्रारूप दोनों पक्षों की सहमति से निश्चित किया जाता है जो निर्धारित अवधि के लिए होता है, और आदेश 10 में नियम क, ख, ग भी अब जोड़े गए हैं, तथा जो मामला मध्यस्थता व सुलह के अंतर्गत निर्धारित किया जाता है वहां मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम 1996 के उपबंध 26 धारा 72 लागू होती है। न्यायिक समझौते जिसमें लोक अदालत भी शामिल है, वहां विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 40 धारा 20 लागू होता है। यह मध्यस्थता निम्नलिखित मामलों पर लागू होता है-  दीवानी मामले, दीवानी वसूली, मकान मालिक किराएदार मामले, बेदखली मामले, श्रमिक विवाद, मोटर दुर्घटना दावे,वैवाहिक मामले, बच्चों की अभिरक्षा भरण-पोषण मामले, ऐसे अपराध के मामले जो धारा 406, 498 ए, भादवि व पराक्रम विलेख अधिनियम धारा 138 दप्रव धारा 125, ऐसे दावे जो मध्यस्थता हेतु उपयुक्त नहीं होते हैं - लोकहित वाले मामले, ऐसे मामले जिसमें शासन एक तरफ से पक्षकार है, आरजीनामा योग्य धारा 320 के अंतर्गत मामले, सीपीसी 89, इसमें 60 दिन में मामले को निपटाया जाना चाहिए और पक्षकारों के विशेष अनुरोध पर समयअवधि 30 दिन बढ़ाई जा सकती है और 90 दिन से अधिक समय मध्यस्थता करने हेतु नहीं दिया जा सकता। परंतु इस सीपीसी 89 के बिना उपयोग किए, अदालत के बिना हस्तक्षेप के, बाहर के बाहर भी पक्षकार आपसी समझौते कर सकते हैं।.... इसी विषय से संबंधित एक मामला सुप्रीम कोर्ट में बुधवार दिनांक 17 फरवरी 2021 को माननीय दो जजों की बेंच जिसमें माननीय न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनागौदर तथा माननीय न्यायमूर्ति विनीत सरीन कि दो सदस्य बेंच के सम्मुख स्पेशल लीव पिटिशन (सिविल) 3063-3064/2021, मद्रास हाईकोर्ट हस्ते रजिस्ट्रार जनरल बनाम प्रतिवादी, के मामले में माननीय बेंच ने अपने 18 पृष्ठों और 23 प्वाइंटों के आदेश में एतिहासिक फैसला दिया कि जो पक्षकार सीपीसी89 के तहअदालती हस्तक्षेप के बिना, विवाद को निपटाने में सहमत हुए, वह कोर्टफीस वापस लेने के हकदार होंगे। उल्लेखनीय है कि दावा दाखिल करते समय नियमानुसार कोर्टफीस भरना होता है। आदेश कॉपी के अनुसार  बेंच ने याचिका को खारिज कर 8 जनवरी 2020 का हाईकोर्ट का जजमेंट बरकरार रखा है और याचिकाकर्ता को कहा 6 माह के अंदर कोर्ट फीस वापस करें। बेंच ने माना है कि जो पक्ष निजी तौर पर सिविल विवाद प्रक्रिया की धारा 89 के तहत विचार किए गए माध्यम के बाहर अपने विवाद को निपटाने के लिए सहमत होते हैं, वो भी कोर्ट फीस वापस लेने के हकदार हैं। निजी समझौतों में भाग लेने वाले समान लाभ के हकदार होंगे, जिन्हें धारा 89 सीपीसी के तहत वैकल्पिक विवाद निपटान विधियों का पता लगाने के लिए संदर्भित किया गया है, बेंच ने कहा - याचिकाकर्ता द्वारा लागू की जाने वाली सीपीसी की धारा 89 और 1955 अधिनियम की धारा 69 ए की संकीर्ण व्याख्या से एक परिणाम निकलेगा, जिसमें एक पक्ष जिन्हें न्यायालय मध्यस्थता केंद्र अन्य केंद्रों को संदर्भित किया जाता है, वे पूर्ण रूप से अपने न्यायालय शुल्क की वापसी हकदार होंगे, जबकि वे पक्षकार जो निजी तौर पर अपने विवाद का निपटारा करके न्यायालय के समय और संसाधनों को बचाते हैं, वे उसी लाभ से वंचित हो जाएंगे, बस इसलिए कि उन्हें निपटारा करने के लिए न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी। ऐसी व्याख्या, हमारी राय में, स्पष्ट रूप से एक बेतुके और अन्यायपूर्ण परिणाम की ओर ले जाती है, जहां पक्षकारों के दो वर्ग जो उक्त प्रावधानों के लक्ष्य और उद्देश्य को समान रूप से सुविधाजनक बना रहे हैं, उनके साथ अलग तरीके से व्यवहार किया जाता है, एक वर्ग को 1955 अधिनियम की धारा 69 ए के लाभ से वंचित किया जाता है। शाब्दिक या तकनीकी व्याख्या, इस पृष्ठभूमि में, केवल अन्याय का कारण बनेगी और प्रावधानों के उद्देश्य को निरर्थक बना देगी और इस तरह, प्रावधानों की एक उद्देश्यपूर्ण व्याख्या के लाभ के लिए इससे विदा होने की जरूरत है। पक्षकारों द्वारा प्राप्त अन्य तरीकों से सौतेला व्यवहार करने का कोई औचित्यपूर्ण कारण नहीं है। अदालत ने जोड़ा कि धारा 69 ए का उद्देश्य उन पक्षों को पुरस्कृत करना है, जिन्होंने अधिक सुलहनीय विवाद निपटान तंत्र के पक्ष में मुकदमा वापस लेने का फैसला किया है, इस प्रकार ये उनको न्यायालय के समय और संसाधनों को बचाने के लिए, जमा की गई अदालत की फीस की वापसी का दावा करने में सक्षम बनाता है। इस संबंध में कर्नाटक,पंजाब और हरियाणा और दिल्ली उच्च न्यायालयों के निर्णयों का उल्लेख करते हुए, पीठ ने कहा, हमारे विचार में, कोई उचित कारण नहीं है कि धारा 69A को धारा 89 सीपीसी में बताए गए अदालत के निपटारे के तरीकों को समझते हुए प्रोत्साहित ना किया जाए और पक्षकारों द्वारा उठाए गए अन्य तरीकों से सौतेला व्यवहार किया जाए।लंबे समय तक चले ट्रायल, या बहु तुच्छ मुकदमों में धन वापसी से इनकार किया जा सकता है। अदालत ने, हालांकि, यह कहा कि ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं, जिसमें पक्षकारों ने एक लंबे समय तक खींचे गए ट्रायल, या बहु तुच्छ मुकदमों के बाद अदालत से संपर्क किया, जो अपने विवादों को निपटाने की आड़ में अदालती फीस की वापसी की मांग कर रहे थे। पीठ ने यह कहा,ऐसे मामलों में, न्यायालय पक्षकारों के पिछले आचरण और समानता के सिद्धांतों के संबंध में देख सकता है, अदालत शुल्क से संबंधित प्रासंगिक नियमों के तहत राहत देने से इनकार कर सकता है। हालांकि, हम वर्तमान मामले को ऐसी प्रकृति का नहीं पाते हैं। बेंच ने कहा, एसएलपी को खारिज करते हुए, अदालत ने कहा कि यह यह हैरान करता है कि उच्च न्यायालय इस तरह के लाभ देने के लिए बहुत विरोध कर रहा है। हालांकि रजिस्ट्री/राज्य सरकार को अल्पावधि में एक समय के अदालत शुल्क का नुकसान होगा, लेकिन लंबे समय में मुकदमेबाजी कअंतहीन चक्र के प्रबंधन के खर्च और अवसर की लागत को बचाया जाएगा।इसलिए यह दावा अपने स्वयं के हित में अनुमति देने के लिए है।

संकलनकर्ता कर विशेषज्ञ एड किशन सनमखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र