शुक्रिया

बीच राह में छोड़कर जाने के लिए शुक्रिया

दर्द दे दे के मुझको रुलाने के लिए शुक्रिया।

मंजिल मुझे मिल ही गई जैसे-तैसे ही सही

मेरी राह में कांटे बिछाने के लिए शुक्रिया।

समय से सीख रखी थी तैराकी मैंने कभी

साजिशन मेरी नाव डुबाने के लिए शुक्रिया।

मेरा सबकुछ लुटा हुआ है पहले से ही यहां

मेरे घरौंदे में आग लगाने के लिए शुक्रिया।

दुख दर्द तुम न देते तो कलम चलती नहीं

ग़म-ए-घूँट मुझको पिलाने के लिए शुक्रिया।

रचनाकार

आशीष तिवारी निर्मल

एचएन 702 लालगांव

रीवा मध्यप्रदेश

8602929616