सियासत के गलियारों का खेल

सियासत के गलियारों में अगर यह खेल न खेला जाता।

हिदुस्तान के इस सफेद अंचल पर ये दाग न लगा पता।


आपस का भाई चारा बटकर खून खराबा न होता ।

मुगलों और गोरों का दासता हमको न झेलना पड़ता।।

सौहार्द  हमारा बिगाड़ कर आपस का फूट न डाला होता।

हिंदुस्तान के सीने पर बटवारे का खंजर न झेलन पडता ।।


सियासत के गलियारों में अगर यह खेल न खेला जाता।

हिदुस्तान के इस सफेद अंचल पर ये दाग न लगा पता।।


सत्ता के कुर्शी के खातिर अपना ईमान न बेचा होता ।

अखंड भारत के उस संकल्प पर काला दाग न लग पता ।

कश्मीर से कश्मीरी पर घात न कई कर पता।

भारत मे ही रहकर वो आज विस्थापित न कहलाता ।


सियासत के गलियारों में अगर यह खेल न खेला जाता।

हिदुस्तान के इस सफेद अंचल पर ये दाग न लगा पता।


ऊँच नीच का भेद जगाकर समाज को न बांटा होता।

समाज को आज समाजिक खाई का दंश न झेलना होता।

देश तोड़ने की राजनीति पर अगर नकेल कसा जाता।

देश के गद्दारो को फन फैलाने का न मौका मिलता।।


सियासत के गलियारों में अगर यह खेल न खेला जाता।

हिदुस्तान के इस सफेद अंचल पर ये दाग न लगा पता।।


सच मे अगर किसान दुर्दशा को सही से सोचा जाता।

आज फिर वो आत्महत्या जैसा काम कभी न दुहराता।

सच मे उसे सुदृढ बनाने का इच्छा सक्ति मन मे होता।

आज उसे फिर गली गली में अस्तित्व के लिए न लड़ना पड़ता।


सियासत के गलियारों में अगर यह खेल न खेला जाता।

हिदुस्तान के इस सफेद अंचल पर ये दाग न लगा पता।


श्री कमलेश झा

राजधानी दिल्ली

9990891378