गांधी जी का भाषाई चिंतन


स्वाधीनता आंदोलन में गांधी जी के योगदान से कोई भी अनभिज्ञ नहीं। वह सिर्फ स्वाधीनता आंदोलन में स्वाधीन भारत का सपना लेकर ही आगे नहीं बढ़ रहे थे बल्कि उनके मन मस्तिष्क में एक ऐसे भारत की कल्पना थी जो स्वाधीन होने के साथ-साथ सामाजिक और नैतिक मूल्यों आदर्शों ,भारतीय संस्कृति की परंपरा से भी आच्छादित हो । वे ऐसे भारत का सपना संजोए हुए थे जहां जन-जन शिक्षित हो। समाज में ना तो जातिवाद हो ना ही आर्थिक असमानता। लोगों के पास रोजगार हो, मकान हो और वे सारी सुविधाएं हैं जो एक संपन्न देश का निर्माण कर सकें। भारत को विकास के मार्ग पर आगे ले जा सके l

    इसी क्रम में हमें गांधीजी के भाषाई चिंतन पर भी विचार करना आवश्यक है | भाषा समाज की ध्वनि है या यूं कहे की धुरी है। भाषा के साथ ही समाज का विकास संभव है। किसी समाज की भाषा जितनी मजबूत होगी समाज उतना ही समृद्ध होगा उसके लिए आवश्यक है संपूर्ण राष्ट्र में एक भाषा का होना। उन्होने दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद हिंदी को हिंदुस्तान से जोड़ने के लिए सबसे पहले 1917 में गुजरात शिक्षा परिषद के अधिवेशन में अंग्रेजी का विरोध किया और हिंदी को प्रस्तावित राष्ट्रीय भाषा के रूप में अपने भाषण के केंद्र में उन्होंने रखा । हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मामले में गांधी जी का यह कदम क्रांतिकारी था, उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूंगा ही माना जाएगा। हम सब जानते हैं कि गांधीजी गुजराती थे और उनकी शिक्षा-दीक्षा विदेश में होने के कारण अंग्रेजी पर उनकी अच्छी पकड़ थी लेकिन भारतीय भाषाओं के प्रति उनके मन में विशेष लगाव था क्योंकि हिंदी संपूर्ण भारतवर्ष में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा थी। तो इस नाते उन्होंने राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के प्रति अपना मत प्रकट किया इस संबंध में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था वे चाहते थे कि देश के सारे लोग हिंदी का इतना ज्ञान प्राप्त कर लें जिसमें देश का काम चलाया जा सके और सभी भारतवासी एक सामान्य भाषा का प्रयोग करें । गांधी जी की भाषाई चिंता उनके उपरोक्त कथन में दिखाई देती है।

गांधीजी ने यंग इंडिया में स्वयं लिखा है अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है ।यह क्या जुल्म की बात नहीं कि अपने देश में मुझे इंसाफ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना होता है । इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालूंगा। अपने हिंदुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी को जानने वाले लोग ही हैं इस संबंध में गांधीजी का मत बेहद स्पष्ट है कि अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हमें होना चाहिए था किंतु अपने हिंदी भाषा को हटाकर नहीं। अपितु अंग्रेजों को अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति को समझाने और उनके व्यापारिक स्तर पर ठीक से जुड़ने के लिए अंग्रेजी भाषा सीखना कोई दोष नहीं। उन्होंने एक स्थान पर लिखा है कि अंग्रेजी शिक्षा लिए बिना अब अपना काम चला सके यह अब संभव नहीं है। जिसके पास यह शिक्षा है उसका अच्छा उपयोग करना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि गांधीजी का भाषा विषयक दृष्टिकोण व्यापक था या संकुचित नहीं।

ज्ञानेंद्र रावत ने अपनी पुस्तक ‘महात्मा गांधी और हिंद स्वराज’ में गांधी जी के अंग्रेजी भाषा के समर्थन के संबंध में स्पष्ट लिखा है कि" गांधी जी अंग्रेजी भाषा का उपयोग भी पश्चिमी सभ्यता के व्यापक स्वरूप के संदर्भ में उस भाषा के लोगों को समझाने के लिए करना चाहते हैं वह अंग्रेजी या हिंदी शिक्षा में धर्म एवं समाज की नीतियों का पालन भारतीय परंपराओं के अनुसार करते हुए अपनी मातृभाषा पर अधिक महत्व देते हैं । समाज में जब व्यक्ति पढ़ा लिखा होगा तब निश्चित रूप से उसे अपनी परंपराओं एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने के लिए उचित मार्गदर्शन प्राप्त होगा"।
भाषा के प्रति गांधी जी के विचार व्यापक थे अंग्रेजी और मातृभाषा दोनों के विषय में उन्होंने अपनी विचारधारा को सर्वथा स्पष्ट किया है उनका विचार था कि जो मनुष्य अपनी मातृभाषा में विचार प्रकट करता है वह कभी काल्पनिक नहीं हो सकते। यही कारण है कि भारतवर्ष में अनेक मात्र भाषाएं हैं और कोई भी व्यक्ति किसी भी भाषा में अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है अंग्रेजी में हमेशा बनावटी पर दिखाई देता है पाश्चात्य संस्कृति में भाषाई बनावट है कल्पना है यथार्थता नहीं है। इसके प्रभाव से भारतीय समाज भी अछूता नहीं है । गांधी जी ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह लोगों का भ्रम है कि हम अंग्रेजी के बिना विकास नहीं कर सकते, रोजगार नहीं पा सकते यह भी एक कारण है जो कि अंग्रेजी समाज पर हावी होती रही और आज के समय में तो जैसे अंग्रेजी ने हमारे पूरे समाज पर वर्चस्व कायम कर लिया है किंतु सच्चाई यह है कि हमारी मूल भावना हमारी मातृभाषा में ही छुपी हुई है ।किसी अन्य भाषा में उसे प्रकट करना संभव नहीं।
हिंदी के संबंध में उन्होंने अपने विचार हमेशा स्पष्ट किए हैं । उनका विचार था कि सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा होनी चाहिए वह हिंदी ही है उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होनी चाहिए हिंदू मुसलमानों के संबंध ठीक रहे इसलिए बहुत से हिंदुस्तानियों को इन दोनों लिपियों का ज्ञान जरूरी है इसलिए बहुत से हिंदुस्तानियों को इन दोनों लिपियों का ज्ञान होना जरूरी है ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल देंगे ।गांधी जी की यह दूरदर्शी नीति वास्तव में हिंदू मुस्लिम एकता को और मजबूत करने में बहुत सहायक सिद्ध हो सकती थी।

रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक "राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का राष्ट्रभाषा सूत्र" गांधीजी के मत को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि सत्य, अहिंसा स्वराज ,सर्वोदय किसी भी अन्य विषय पर आज उनके इतने उपदेश नहीं है जितनी भाषा समस्या पर अंग्रेजी भारतीय भाषाओं राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदी उर्दू की समस्या पर उन्होंने जितनी बातें कही है बे बहुत ही मूल्यवान है। किसी भी राजनीतिक नेता ने इस समस्या पर इतनी गहराई से नहीं सोचा किसी भी पार्टी और उसके नेताओं ने भाषा समस्या के सैद्धांतिक समाधान को नित्य प्रतिदिन की कार्यवाही में इस तरह का अमलीजामा नहीं पहनाया जैसे गांधी जी ने। उनकी नीति के मूल सूत्र छोड़ देने से वह समस्या प्रतिदिन उलझती जा रही है

यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जिन महान विचारकों ने अपना सुझाव दिया उनमें से अधिकांश हिंदी भाषी थे जैसे केशवचंद्र सेन जो कि स्वयं बांग्ला भाषी थे और महात्मा गांधी गुजराती। मराठी भाषा भाषा काका कालेलकर ने देश में घूम घूमकर हिंदी का प्रचार-प्रसार किया । सुभाष चंद्र बोस, दयानंद सरस्वती भी हिंदी के प्रबल समर्थक थे। नागरी लिपि के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति श्री शारदा चरण मिश्र ने तो सन 1910 में यहां तक कह दिया था कि यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए यह गौरव का दिन होगा जिस दिन में सारे भारतवासियों के साथ हिंदी में वार्तालाप करूंगा । हिंदी के प्रति लचीला दृष्टिकोण अपनाने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर का योगदान भी कम नहीं। उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ अहिंदी भाषा भाषी होते हुए भी हिंदी का प्रबल समर्थन किया राष्ट्रभाषा के प्रति महात्मा गांधी की संकल्पना पूर्णरूपेण निश्चित थी। राष्ट्रभाषा किसी भी राष्ट्र की शक्ति होती है ,पहचान होती है, उसका प्राण होती है और उसकी पूंजी होती है सार्वभौमिक एकता और अखंडता का प्रतीक होती है। यूं तो भारत में अनेक प्रादेशिक भाषाएं हैं लेकिन इन प्रादेशिक भाषा भाषियों को एक सूत्र में बांधने के लिए एक राष्ट्रभाषा का होना आवश्यक है। महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र मजबूत नहीं हो सकता बे भारतवर्ष की इसी कमजोरी को दूर करना चाहते थे इसलिए उन्होंने संपूर्ण भारत को एक सूत्र में बांधने वाली हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन करने के लिए अपना प्रबल समर्थन दिया। बंगाल के सामाजिक चिंतक केशव चंद्र सेन ने एक सभा में कहा था कि अगर हिंदी को भारतवर्ष की एक मात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाए तो सहज ही यह एकता संपन्न हो सकती है ।महात्मा गांधी ने भी केशव चंद्र सेन के समान हिंदी की पक्षधरता की उनका मत स्पष्ट था कि राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज हो और सुगम हो ।जो धार्मिक और आर्थिक राजनीतिक क्षेत्र की माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो ,जिसमें बोलने वाला बहुसंख्यक समाज हो जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो ।अंग्रेजी किसी भी तरह से इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

- डॉ सरोज कुमारी
वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर
विवेकानन्द कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय