"निलंबित कुर्सी का तोहफा"


निलंबित कुर्सी की बात तो गली के कुत्तों को भी हजम नहीं हो रही है ,वह भी घास खाकर पचाने की कोशिश कर रहे हैं। जो आदेश की पीपुड़ी बजाते थे वह आज "साइड टू लाइन" हो गए, कार्य शैली का मिजाज तो मौसम की भांति हो चला है कब किस पर मेहरबान हो जाए ?और कब किस पर बिजली गिर जाए? कुछ कहा नहीं जा सकता निलंबित अभियंता प्रमोट होकर इंजीनियर की कुर्सी का सरताज हो गया है। आजकल कार्य के तौर तरीकों में अपना ही आनंद है, कुर्सी घुमाने से लेकर ऊपर नीचे कब किसे कहां बैठना है? एसी रूम के सामान्य बातें हो चली हैं वैसे तो प्रशासनिक फेरबदल निरीक्षण के तराजू के बाद से तय होता है पर यहां तो अपने ही बात से तय हो रहा है लापरवाह अफसरों की तो बैंड बाजा बारात आ गई कब किस की प्लेट सज गई और चाचा मामा के लड़के बन उन पर टूट पड़े कुछ कहा ही नहीं जा सकता वैसे भी निलंबित कुर्सी के चर्चे आजकल जुबा केसरी हो चले हैं जिंदगी में मजा तो सिर्फ कुर्सी का है साहब! 'अपने जमीर को मक्खन लगाते रहिए और कहते हैं चलिए कि इसे पाना आसान नहीं' और दुर्भाग्यवश मिल भी गया तथा पांच उंगली घी में हाल हलवाई की भांति होगा , दुकान में कितनी भी अवैध मक्खियां और चीटियां हो पर वह अगर कह दे तिल और मावा है तो मानना होगा क्योंकि दुकान नुमा ऑफिस में उसकी तूती बोलती है, परिवर्तन का नाम जिंदगी है कभी-कभी निलंबित कुर्सी की भूल तोहफा भी है।

कवि कुमार प्रिंस रस्तोगी
लखनऊ,उत्तर प्रदेश ...