कैसा यह शोर

सर-सर,मर-मर यह पत्तों का शोर,
कैसी उदासी,कैसी बेचैनी,
किसलय की गांठों में अकड़न,
किससे किसकी हो गई अनबन,
कहां छुप गया स्वर्णिम भोर,
सर-सर,मर-मर यह पत्तों का शोर!
यह झकोर,गर्जना वृक्षों की,
जिसे सुना है पहली बार,
नहीं दिख रही इनमें कोमलता,
व्यथित हृदय इनका है विह्वल,
क्यों रो रहे यह जोर-जोर,
सर- सर,मर-मर यह पत्तों का शोर!
सागौन के ,थाल से पत्ते,
गिर रहे धरा पर जैसे लट्ठे,
चंदन के वृक्षों के फूल,
फूट रहे हैं ,किसके माथे,
ना जाने किससे लगी है किसकी होड़,
सर-सर,मर-मर यह पत्तों का शोर,
सर-सर,मर-मर यह पत्तों का शोर।

अंंजनी द्विवेदी वरिष्ठ गीतकार कवयित्री
व शिक्षिका,स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार,
अगस्त पार रोड,नवीन फल मंडी के निकट
देवरिया ,उत्तर प्रदेश