मनुष्य को हमेशा सद्मार्ग पर चलाना चाहिए: आचार्य शिवम द्विवेदी


उरई/जालौन। सत्यकर्म का हमेशा फल मिलाता है। मनुष्य को जीवन में हमेशा सद्मार्ग पर चलना चाहिए। यह बात ग्राम कैंथवा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन भगवताचार्य शिवम द्विवेदी ने कही। भागवत कथा के तीसरे दिन सोमवार को आचार्य शिवम द्विवेदी ने भगवत प्रेमियों को बताया कि जब तक जीव माता के गर्भ में रहता है, तब तक वह बाहर निकलने के लिए छटपटाता रहता है। उस समय वह जीव बाहर निकलने के लिए ईश्वर से अनेक प्रकार के वादे करता है। मगर जन्म लेने के पश्चात सांसारिक मोह माया में फंसकर वह भगवान से किए वादों को भूल जाता है। इसके परिणामस्वरूप उसे चैरासी लाख योनि भोगनी पड़ती है। बताया कि व्यक्ति अपने जीवन में जिस प्रकार के कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे मृत्यु मिलती है। सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती को पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाहा होना पड़ा। कथा में उत्तानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा को सुनाते हुए समझाया कि ध्रुव के सत्कर्मों, साधना और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा के परिणाम स्वरूप ही उन्हें बैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। इस मौके विवेक अवस्थी, पुष्पेंद्र सेंगर, सचिन दुबे, प्रवीण सेंगर, अभय, धीरज, अंजली, मनीषा, सुषमा, प्रेमलता, हेमा आदि भक्त मौजूद रहे।