बस यूँ ही 10

कुछ लोग आते हैँ बड़ी शान से
हमारी आवाज की खबर नहीं
लोग दिखावा हैँ जो किया करते
ऐसे दिखावे की जरुरत ही नहीं ।।
हम अड़े रहें अपनी जिद पर
तुम अड़े रहो अपनी जिद पर
एक तरफ ज़िद और है अड़
तीजी आंख रही शांति जकड़ ।।
तुम रोटियां उगाते रहे
हम रोटियां खिलाते रहे
किसे यह रास न आया
हवाओं में जहर मिलाया ।।
यूँ तो बहुत गणित है मेरे आस पास
हर गणित नहीं होता है मुझे खास
वतन उस गणित का करें हम क्या
जिसमें गरीबों का ध्यान भी न रखा ।।
लाशें तैर जाती हैँ पानी पर
हमें कुछ यूँ सिखाने के लिए
अपना बजन नहीं जाता साथ
जी लो तुम मानवता के लिए ।।
यूँ नहीं कृषक अड़े हैँ रहते
कितना कुछ हैँ रोज वे सहते
पसीने की कीमत तो जानिए
रीढ़ की हड्डी वैसे ही कहते ।।
हिमालय से और गंगा न निकलेगी
इसी गंगा की लाज आप रख लीजिये
खून की कीमत देश में सस्ती हो रही
खून और पानी दोनों को बचा लीजिये।।
देवभूमि अब तप के लिए कहाँ बची
शांति को अब कैसे रखोगे यहाँ बची
रे विचारों को ही बदलना होगा वतन
कण -कण में हो शांति करो रे जतन ।।
शीशा टूटे तो कभी तस्वीर नहीं बदलती
शख्शियत ठीक हो तो तस्वीर नहीं बदलती
देखिए कितने भी भारत में रंग भरे जाएं
तीन रंगों की तासीर नहीं बदलनी चाहिए ।।
हर शिशु पर भी है जिम्मेदारी
भारत की सुखद तकदीर की
क्यों नहीं सोचते हैँ यहाँ बड़े
सुलझे सब कुछ ही बिना लड़े ।।
कब तक चलेंगी ये विकारों की आँधियां
चीखने लगी हैँ सारी वतन की वादियाँ
कौन पवनपुत्र का अब दूत यहाँ आएगा
भारत के चमन में अमन के गीत गाएगा ।।
किसी को अपनी कमियां पता नहीं
सच इसमें उसकी कोई खता नहीं
गिना दे कोई उसे गलती गर एक
वतन जरा सा सोच ले पल तो एक ।।
किसके रिश्ते कब बदला करते हैँ
यहाँ लोगों को बदलते देखा है
देखा सूरज चाँद कब बदलते हैँ
हमने मौसम को बदलते देखा है ।।
गुलाबों को समझना भी जरुरी है
कांटों से कभी नफरत ही नहीं करते
बिखरें सूखें या चाहे मर क्यों न जाएं
मैंने देखा गुलाब खुशबू नहीं छोड़ते ।।
अहिंसा से अ हटाना कितना आसान है
जितना कि मानवीयता में अ लगा देना
लेकिन सबसे कठिन है जुड़कर समाज से
लोगों के ह्रदय में एक कोना बना लेना।।
वेक्सीन खबर अभी हज़म भी न हो पायी
क्यों मानव से नाराज हो गयी प्रकृति माई
गलेशियर फटने से बड़ी अशांति छा गयी
ईश्वर रहम कर मिटा अशांति जो है आयी ।।
वतन तुम गुलाब गुलाब तोड़ रहे थे
वतन गुलाब गुलाब तुम कर रहे थे
गुलाब अपने गुलाब को घर छोड़ वे
जान पर वतन के लिए लड़ रहे थे।।
प्रकृति से उपजकर प्रकृति में मिलना है
उसे अनदेखा करना सिर्फ भूल करना है
अक्सर यही भूल पाप में बदल जाती है
रुष्ट होती प्रकृति आपदा आ ही जाती है ।।
वो काट रहा था पेड़ कि पेड़ रो पड़ा
महसूस नहिं होता मैं सांसे ले रहा
मां बाप से पूछ लेना मानव तू जरा
कैसा होता है किसी गर्दन पर छुरा ।।
सारे फूलों की खुशबू रहती कम
जितनी पवित्र ईश्वर्यालय में आती
ईश्वर नहीं हो अपने ह्रदय में जब
तब ईश्वर को कहीं भी नहीं पाती।।
ख़ामोशी को उसने ख़ामोशी कहा नहीं
खामोश शब्दों को भी मां पढ़ सकती थी
कागज और कलम की हमें जरुरत ही नहीं
कभी जरुरत न थी उसे किसी भी छंद की ।।
हाथ में सागर आते हैं सागर छूट जाते हैं
बूंद बूंद भरते और उठाते रहेंगे हम सागर
सुख दुख स्थायी नहीं हैँ आते और जाते हैँ
प्रभु कृपा और परिश्रम से भरते हैँ सागर ।।
घायल आदमी उसे हँसता नजर आया
शायद उसे अपनी दौलत का गुरुर था
घाव मे भी उसे ' कुछ नहीं 'नजर आया
वह अभी प्रकृति के सत्य से ही दूर था ।।
वायदा निभाने की कोई परंपरा नहीं होती
हर कार्य करने में हमारी स्व आत्मा है होती
संस्कृति व संस्कार की एक घड़ी नहीं होती
वायदा निभे हरदम बात एक की नहीं होती।।

पूनम पाठक