उड़ान भरें अब नील गगन में


गगन क्षितिज की अथाह सीमा पर आओ भरें एक लंबी उड़ान

आपनी बल का थाह लिए आओ भरे एक ऊची उड़ान।।

इस नभ की अनंत उचाई इसका रखना हरदम भान
पॉव जमीन पर रखकर आओ भरें एक ऊची उड़ान।।

थाह लिए बिन उतर गए तो नभ की सीमा है अनंत
राह तय किये बिना निकल गए तो भटक कर हीं होना अंत।।

उड़ान सीखें उस चील से जिसकी दृष्टि पर केवल लक्ष्य
धरा से कोसों दूर होकर भी सधी रहती है केवल लक्ष्य।।

उड़ने को तो निल गगन है जितनी चाहे भरें उड़ान
हिम्मत हौसला और साहस से 
करते जाएं पथ आसान।।

उड़ान हो अपना भी जैसे खग विहग लेते उड़ान
शाम ढले फिर लौट कर आना दाना लये फिर भरे उड़ान।।

कलरव और करतल ध्वनि की गूंज रहेगी अपने धाम
दाना चुग्गा और पानी संग खुशहाली होगी अपने धाम

श्री कमलेश झा
नगरपारा भागलपुर
बिहार