न्याय की परिधि में आम और खास


देश में जाति-धर्म की परिधि से भी परे है एक समाज ,

जिसके काफ़िले को गुजरने के लिए आम जनमानस को , घंटो सड़कों पर बंधक बना लिया जाता है ,
जिनके आगे कानून के लंबे हाथ भी बौने पड़ जाते हैं ,
जेल की कालकोठरियाँ भी आलीशान कमरों में तब्दील हो जाती है ।
जिस न्यायलय में एक तारीख़ के लिए आम आदमी की एड़ियां घिस जाती है ,
उसी न्याय के मंदिर में दिन हो चाहे रात , उनकी त्वरित सुनवाई हो जाती है ।
कहते हैं हमारा संविधान सभी को बराबरी का हक़ देता है ।
आम हो या ख़ास , सबको एक नज़र से देखता है ,
मग़र ,
किताबी बातों का कोई मोल नही ।
संविधान बने हुए भी तो काफी साल बीत गए ।
इतने सालों में , मौसम की मार से शायद ,
कानून की देवी की आंखों पर बंधी काली पट्टी में सुराख हो गई हो ,
जिससे उसे भी आम आदमी और रसूखदार का फर्क नज़र आने लगा हो ।
नेता हो , अभिनेता हो अथवा कोई उधोगपति ,
हत्या , बलात्कार , भ्रष्टाचार , देशद्रोह की धाराओं से सुसज्जित व्यक्तित्व मग़र ,
ख़ुद को ईमानदार और बेदाग़ हीं मानता है ।
ऐसा क्यूँ होता है कि ,
जब कोई नेता भ्रष्टाचार में फंस जाता है ,
तो शासन-प्रशासन की साज़िश बताता है ,
संचार माध्यमों पर दिन-रात हो-हल्ला मचाता है ,
और येन-केन प्रकारेण मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है ।
अभिनेता की गाड़ी से मजदूर कुचला जाता है फिर भी , चश्मदीद गवाहों के बावजूद जमानत पर ठाठ की जिंदगी बिताता है ।
उधोगपति बैंकों का पैसा गबन कर विलुप्त हो जाता है ,
मग़र अधिकारियों को भनक तक नही लग पाता है ।
बेईमानी तो सिर्फ आम आदमी हीं कर सकता है , रसूखदार नही ।
कानून दोनों के लिए अलग-अलग है शायद ।
रदुखदारों को बेल मिलता है और आम आदमी को जेल ।
रसूखदार तो आसानी से पेरोल भी पा जाता है मग़र ,
छोटी सी छोटी घटनाओं में भी आम आदमी की जिंदगी , कालकोठरी में गुजर जाती है ।
पीढ़ी दर पीढ़ी वह न्याय की आस में पिसता रहता है ।
छोटे-मोटे कर्ज़ के लिए भी बैंकों द्वारा प्रताड़ित होता है ।
ऐसा प्रतीत होता है जैसे तमाम गलत कामों का ठेका सिर्फ आम आदमी ने ले रखा है ,
रसूखदार सारे गंगाजल से धुले हैं ।

सुभाष चंद्र झा 'अकेला '
जमशेदपुर , झारखंड