रहने दो ना रैन अभी

 

अब नीर भरे 

उर नभ नीरद,
और नैन बने
पीड़ा के सनद।
वह चली सुखी
नदियां मन की,
झरते अश्रु
झर झर अविरत।
गीले हैं दोनों नैना अभी,
रहने दो ना रैन अभी।
भीतर बाहर घनघोर तमस,
है ताप अधिक,
मन गया झुलस।
जैसे मन हो
कोई विकट गुफा,
जहां भोर का निकले
ना कनक कलश।
बेचैन सा है चैन अभी,
रहने दो ना रैन अभी।
अतृप्त ह्रदय
आकुल सा मन,
जैसे चंचल हो कोई पवन।
मौन अधर में शब्द छुपे हैं,
शिथिल से है
दोनों मुक नयन।
मौन सी है बैन अभी,
रहने दो ना रैनअभी।

कामिनी मिश्रा