"बिमार होने पर पत्नी की सेवा करने वाला पति क्या जोरू का गुलाम होता है"


कहा जाता है कि पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक है, और शादी का बंधन समान अधिकार देता है। तो फिर क्यूँ जब पत्नी पति का सर या पैर दबाती है तो सेवा का नाम दिया जाता है, और अगर पति पत्नी का सर या पैर दबाता है तो जोरू का गुलाम और न जाने क्या-क्या उपनाम दिए जाते है, ऐसी मानसिकता क्यूँ।
जब पत्नी कार्येषु मंत्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, शयनेषु रंभा बनकर पति के कदम से कदम मिलाकर संसार रथ की धुरी बनकर साथ देती है, तो पति क्यूँ पत्नी की तबियत खराब होने पर सर नहीं दबा सकता।
सरल सहज और पत्नी का खयाल रखने वाले पति को सही में आदर्श पुरुष का उपनाम देना चाहिए जिसके दिल में औरत के प्रति सौहार्द भाव और अपने समकक्ष तुलना का भाव रहता है।
सात फ़ेरे लेते वक्त हर फ़ेरे में पति आगे रहता है जो दर्शाता है कि ज़िंदगी में आने वाली हर विपदा से तुम्हारी रक्षा करूँगा तुम्हारा सम्मान करूँगा। आखरी फ़ेरा मोक्ष का है जिसमें पत्नी का यही भाव रहता है कि आपके तरफ़ बढ़ने वाली मृत्यु को आप तक पहुँचने से पहले मैं गले लगा लूँगी। पत्नी की सेवा करने वाले पति एक उदाहरण है मर्द की महानता का, जिसे निम्न सोच वाले कभी नहीं समझ पाएंगे। जैसे पत्नी के पैर दबाने वाला पुरुष जोरू का गुलाम नही होता वैसे ही पत्नी की भूल पर या गुस्से में अगर दो बोल बोल देता है तो निष्ठुर भी नहीं कहलाता। वो पति-पत्नी का आपसी मामला होता है गुस्सा शांत होते ही वही पति माफ़ी भी मांगता है।
पत्नी अगर नौकरी करती है तब दोनों हर काम बांट लेते है तो क्या बुराई है। पत्नी भी इंसान है, थकती वो भी है। अगर पति ने एक कप कोफ़ी पिला दी तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ेगा। कई माँओं को ये बात हज़म नहीं होती की बेटा बहू का हाथ बंटाए। एक बेटा माँ के पैर दबाता है उसे गलत नहीं माना जाता तो पत्नी की परवाह करने पर क्यूँ चार बातें सुनाई जाती है। एक पति के भरोसे अपना बहुत कुछ छोड़ कर एक लड़की नई ज़िंदगी में कदम रखती है तब पति उसका ख़याल नहीं रखेगा तो कौन रखेगा।
इसी माँ को जब दामाद अपनी बेटी की ख़ातिरदारी करता है तो वो आदर्श दामाद लगता है, नांहि उसमें कोई बुराई लगती है। ऐसी दोहरी मानसिकता क्यूँ?
हमने देखा है जब मजाक में भी कोई फेसबुक पर ऐसी कार्टून के तौर पर भी एक पति की अपनी पत्नी के पैर दबाने वाली पिक कोई ड़ालता है तब पुरुष को लताड़ ने वाली एक से कमेन्टस होती है, कोई भी इस बात को सहज नहीं लेता। यही मानसिकता साबित करती है कि समाज की सोच कितनी निम्न और पिछड़ी हुई है। ये बात भी पितृसत्तात्मक वाली श्रेणी में आती है, क्यूँकि मतलब तो यही हुआ कि पत्नी का वजूद कोई मायने नहीं रखता, पत्नी बिमारी में तड़पती है तड़पने दो।
दर असल पत्नी का दमन करने वाला, बात-बात पर ताने मारने वाला और पत्नी की परवाह न करने वाला पति नपुंसक है। स्त्री को सम्मान और प्यार से रखने वाले पति ही सही मायने में असली मर्द है, तारिफ़ के काबिल है, पति कहलाने के हकदार है। क्यूँकि पति का मतलब आधिपत्य जमाने वाला नहीं पत्नी का कदम-कदम पर साथ देना और रक्षा करना होता है।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु