योग- हस्त-मुद्राशास्त्र : वरुणमुद्रा


वरुण मुद्रा- वरुण का मतलब होता है-जल। यह मुद्रा जल की कमी से होने वाले सभी तरह के रोगों से हमें बचाती है। हमारा शरीर पाँच तत्वों से मिलकर बना है। जब हमारे शरीर में जल और वायु तत्व का संतुलन बिगड़ जाता है तो हमें वात और कफ संबंधी रोग होने लगतें हैं। इन सभी रोगों से बचने के लिए वरुण मुद्रा की जाती है। जल का गुण होता है तरलता और जल भोजन को तरल बनानें में ही मदद नहीं करता बल्कि उससे कई प्रकार के अलग-अलग तत्वों का निर्माण करता है। अगर शरीर को जल नहीं मिले तो शरीर सूख जाता है तथा शरीर की कोशिकाएं भी सूखकर बेकार हो जाती हैं। जल तत्व शरीर को ठंडकपन और सक्रियता प्रदान करता है। वरुण मुद्रा जल की कमी से होने वाले सभी तरह के रोगों से बचाती है।  

विधि - सबसे पहले जमीन पर कोई चटाई बिछाकर उस पर पद्मासन, सिद्धासन या कोई और  ,आरामदायक आसन में बैठ जाएं। सीधे बैठें, रीढ़ की हड्डी सीधी रहे। दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रख लें और हथेलियाँ आकाश की तरफ करें। फिर सबसे छोटी अँगुली (कनिष्ठा) के ऊपर वाले पोर को अँगूठे के उपरी पोर से स्पर्श करते हुए हल्का सा दबाएँ तथा बाकी की तीनों अँगुलियों को सीधा करके रखें। अपना ध्यान श्वांस पर लगाकर अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के दौरान श्वांस सामान्य रखना है। अब ध्यान लगाएं।

समय व अवधि -  इसके अभ्यास का समय चैबीस मिनट है। कुछ दिनों के अभ्यास के उपरान्त अभ्यास अवधि दुगनी कर दें। सर्दी के मौसम में अभ्यास की अवधि कम ही रखें क्योंकि इस मुद्रा में जल और अग्नि के बीच चक्र बनता है और इससे एक विशेष प्रतिक्रिया होती है जो हमारे शरीर के अन्य तत्वों को संतुलित करने में बेहद सहायक सिद्ध होती है। सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता है। 

लाभ- जब शरीर में जल तत्व की अधिकता हो जाए तो इस मुद्रा का प्रयोग करें। जब पेट में पानी भर जाये जिसे जलोदर कहते हैं, फेफड़ों में पानी भर जाये, हाथों, पैरों में शरीर में कहीं भी सूजन आ जाये तो यह मुद्रा करें। नजले, जुकाम में जब नाक से पानी बह रहा हो, आँखों से पानी बह रहा हो, साईनस के रोग हो जायें, फेफड़ों में बलगम भर जाए, तो इस मुद्रा का प्रयोग करें। फाइलेरिया, हाथी पांव में भी इस मुद्रा से लाभ होगा। इसका नियमित अभ्यास करने से साधक के कार्यों में निरंतरता का संचार होता है। वरुण मुद्रा स्नायुओं के दर्द, आंतों की सूजन में लाभकारी है। इससे रक्त शुद्ध होता है, अधिक पसीना आने की समस्या खत्म होती है। यौवन को बनाये रखने के साथ-साथ शरीर को लचीला भी बनाती है। आँत्रशोथ तथा स्नायु के दर्द और संकोचन को रोकती है। चर्मरोग से मुक्ति दिलाने, खून की कमी को दूर करने में सहायक है। इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से शरीर का रूखापन दूर होता है।

सावधानियां - कफ, शर्दी, जुकाम वाले व्यक्तियों को इस मुद्रा का अभ्यास अधिक समय तक नहीं करना चाहिए। गर्मी व अन्य मौसम में प्रातः सायं 24-24 मिनट तक कर सकते हैं। अच्छा हो किसी मार्गदर्शक के निर्देश में ही इस मुद्रा का प्रयोग किया जाय।

डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’