दुःख के बदलते रंग...!

रोते बिलखते आया जग में,          

              हँसते जाते देखा है।
 जान न पाई जिनको दुनिया,
         अद्भुत जीवन का रेखा है।
संघर्षों की बीच भवर में,
       किया नौका उलटकर वार।
संकट क़िस्मत पर मंडराता,
     लटकती सिर पर तलवार।
जितनी चादर हो तन पर,
      फैलाओ उतना ही पाँव।
क्यों खाई में कूद गये,
         कहीं धूप कहीं छावं।
अमृत की धारा विष लगे,
         घुट घुट कमर को तोड़ा।
 सुख बैरी काँटा लगे,
        दुःख जीवन को मोड़ा।
    मौसम ऋतु की भाँति,
            दुःख भी रंग बदलता।
कई रूप में भेष बनाकर,
           रंग में रंग मिल जाता।
इंसा को पीछा न छोड़े,
           जकड़ा रहता हरदम।
कभी बेरोज़गारी बनकर,
          कभी भूख की आदम।
छा अंधेरी घर को जाता,
        गरीबी की मोहर बनकर।
शान शौक़त की तोड़ दीवारे,
            रहता हरदम तनकर।
माया उसकी कोई न जाने,
         कब गाज गिर जायेगा।
दुनिया को देता धोखा जो,
         सुख कहाँ को पायेगा।
घेरा जिसको दुःख खनक की,
           रह रह पीड़ा सतायेगा।
रंग भी कितने अजब तेरे,
           कब कहाँ गिर जायेगा।
किस रूप में न जाने कब,
       भेष बदलकर आयेगा।
जिंदगी की बचा ख़ुशी की,
        रस निचोड़ लें जायेगा।
पग पग में गुमान जहाँ पर,
        मिटते जिनकी लेखा है।
दरिद्रता की धड़कन बन,
   दुःख के बदलते रंग देखा है।

             दिव्यानंद पटेल
             विद्युत नगर दर्री
             कोरबा छत्तीसगढ़