कोमल भावनाओं के सम्यक कलाकार जयशंकर प्रसाद


प्रसाद जी हिंदी साहित्य के छायावादी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। महादेवी वर्मा, पंत, निराला और प्रसाद छायावाद के चार स्तम्भ माने जाते हैं किंतु इन सभी कवियों के काव्य में एकरूपता होते हुए भी उनके भेद परिलक्षित होते हैं।

जहां निराला के काव्य में उद्दात्त, ओज तथा क्रांति का भाव प्रबल है वहां महादेवी की कविताओं में रहस्य और वेदना की ही प्रबलता है। जहां पंत का कवि प्रकृति की पृष्ठभूमि में निर्मित होकर पल पल परिवर्तित होता रहता है वहां प्रसाद का काव्य करुणा और माधुर्य के आधार पर आनंदवादी दर्शन की स्थापना करने का प्रयास करता है। सौंदर्य के प्रति महादेवी की दृष्टि चित्रकार की दृष्टि है। पंत की दृष्टि कौतूहल जिज्ञासा की दृष्टि है। निराला की दृष्टि उद्दात्त से नृप की दृष्टि है, वहां प्रसाद की दृष्टि पारस्परिक उपभोक्ता की दृष्टि है।

छायावाद का प्रार्दुभाव द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता है, विरोध में हुआ है फलस्वरुप इतिवृत या रूढ़ि के विरुद्ध सम्पूर्ण छायावाद में कर्कश स्वर सुनायी पड़ता है। प्रायः सभी कवियों ने साहित्य के भाव एवं कला पक्ष दोनों में कांति लाने का प्रयास किया है। एक तरफ पुरानी काव्य पद्धति, काव्य शैली इनको मान्य नहीं है वहां दुसरी तरफ पुराने सामाजिक आचार विचार भी स्वीकार नहीं है।फलस्वरूप छायावाद में अन्तर्मुख विशेषताएं परिलक्षित होती है।

छायावाद की मुख्य विशेषता है रूढ़ि के प्रति विद्रोह, समाज के प्रति विद्रोह, काव्यशास्त्रीय पद्धति के प्रति विद्रोह, प्रथाओं से पलायन की प्रवृति, अतीत के विवरों में विचरण की प्रवृति, कल्पना की अतिशयता, रहस्यात्मकता, अतिशय बौद्धिकता, स्वछंदवादी प्रवृति, प्रकृति प्रेम, कोमल कांत पदावली प्रयोग, नवीन अलंकारों का सृजन, नया चंद विधान व राष्ट्रीयता आदि। उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर प्रसाद के काव्य की समीक्षा की जा सकती है।

प्रसाद जी ने समाज के यथार्थ से फंसा मन को अधिक ग्रहण करना चाहा है। वे एक ऐसी भावभूमि में जाना चाहते हैं जहां कोलाहलपूर्ण ध्वनि न हो, जहाँ सागर की लहरें संगीत गाती हों और जहाँ अम्बार अपने कानों को खोलकर इन संगीत लहरियों का यथार्थ से पूर्णतः पलायन कवि के लिए सम्भव नहीं है, इसलिए वह नाविक से प्रार्थना करता है कि उसे इस दुनियां से भुलावा देकर वहां ले चले-

"ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
                    जिस निर्जन में सागर लहरी,
                      अम्बर के कानों में गहरी,
                    निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
                  तज कोलाहल की अवनी रे । "

इस प्रकार प्रत्येक छायावादी कवियों की तरह प्रसाद ने भी पलायन की प्रवृति को ग्रहण किया है किंतु समाज के प्रति उनके ह्रदय में वैसा विद्रोह भाव नहीं है जैसा निराला में है। फलस्वरूप शांतिपूर्ण ढंग से प्रसाद इस दुनिया से अलग हो जाना चाहते हैं।

समाज से पलायन के पश्चात कवि प्रसाद जिन क्षेत्रों को ग्रहण करना चाहते है वे क्षेत्र हैं अतीत, कल्पना, प्रकृति, और रहस्य इन सभी में प्रसाद की प्रकृति अतीत ही अधिक लगी है, अपनी इसी प्रकृति के कारण उन्होंने 'कामायनी महाकाव्य' का सृजन किया है। ऐतिहासिक नाटकों का सृजन भी प्रसाद की इसी प्रकृति की देन है। 'शेर सिंह की शास्त्र समपर्ण', 'कृष्ण जयंती' आदि कविताएँ उनके अतीत मोह की ही देन है। 'कामायनी' के कवि ने जलप्लावन के पश्चात विनष्ट सृष्टि के पश्चात नये सृजन का वर्णन किया है। कामायनी में उन्होंने मानव के विकास का चित्र उपस्थित किया है। कामायनी में आदि मानव का चित्र उपस्थित करते हुए कवि का कहना है-

"देव सृष्टि की सुख विभावरी,
ताराओं की कलना थी ।"(—कामायनी, पृ०8 )

प्रसाद की झरना और लहरें अतीत मोह से सम्बंधित अनेक गीत रचे जा सकते हैं। प्रसाद की कविताओं में कल्पना और मोह प्रचुर मात्रा में है साथ ही छायावादी कवियों ने कल्पना के आधार पर ही प्रकृति को ग्रहण किया है। प्रकृति दो तरह की होती है। एक सरस कोमल प्रकृति दूसरी उग्र कराल भयंकर प्रकृति। सच्चे कलाकार की प्रवृति दोनों प्रकार की प्रकृतियों में लगती है। जो सरस, कोमल प्रकृति को रूप को ही ग्रहण करता है वह भोग लिप्सा कहलाता है। प्रसाद ने दोनों प्रकार के प्रकृतियों को अपनाया है। उन्होंने निम्नलिखित कविता में सांग रूपक के द्वारा प्रकृति का मनोरम रूप उपस्थित किया है-

"बीती विभावरी जाग री!
                  अम्बर पनघट में डुबो रही
                  तारा घट ऊषा नागरी।
खग कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
                  लो यह लतिका भी भर लाई
                  मधु मुकुल नवल रस गागरी।"

प्रसाद के काव्य में उग्र प्रकृति का चित्रण भी पूर्ण सफलता के साथ हुआ है। कामायनी का एक-दो चित्र देखा जा सकता है।

प्रसाद के काव्य में रहस्यात्मकता सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। रहस्य में ईश्वर तथा ईश्वरीय शक्ति की चर्चा उपस्थित की जाती है। रहस्यवाद में जीवन दर्शन , जीवन तथा ईश्वर से सम्बंधित सूक्ष्म तत्व आदि का वर्णन उपस्थित किया जाता है। प्रसाद जी की निम्नलिखित कविता, दार्शनिक एवं रहस्यात्मक प्रकृति के प्रश्न हैं-

"नित्य यौवन कवि से ही दीप्त।
विश्व की करुणा का कामना मूर्ति।।
स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण।
प्रगट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति।।"

प्रसाद के काव्यों की सबसे बड़ी विशेषता उनके सौंदर्य के चित्रण में है। सौंदर्य वर्णन प्रत्येक छायावादी कवि की मौलिक विशेषता है। प्रसाद जी सौन्दर्य के पारखी कवि हैं। पंत का सौंदर्य जिज्ञासा भाव से परिपूर्ण है। निराला के सौंदर्य में ओज और उद्दातता की प्रधानता है और महादेवी वर्मा का सौंदर्य रहस्य से परिपूर्ण है किंतु प्रसाद का परवर्ती उपभोक्ता का सौंदर्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रसाद जी ने सौंदर्य के अंग-प्रत्यंगों का अत्यंत ही सूक्षम परिचय प्राप्त किया है। जितना सुंदर सूक्ष्म विश्लेषण प्रसाद के सौंदर्य वर्णन में मिलता है वह अनयत्र दुर्लभ है।

किसी भी वस्तु को सुंदर रूप में उपस्थित करना छायावादी कवियों की विशेष प्रवृति रही है और सौंदर्य के प्रति यह आकर्षण भारतीय वांङमय में सर्वत्र दिखलायी पड़ता है क्योंकि सौंदर्य मन को आकृष्ट करने का सबसे बड़ा प्रमुख साधन है। सौंदर्य काव्य की आत्मा है। भारतीय वांङमय में सत्यं शिवं सुंदरम की कल्पना इसीलिए की जाती है ताकि जो सत्य हो उसे कल्याणकारक भी होना चाहिये और कल्याण से परिपूर्ण सत्य वस्तु तो सौंदर्य से परिपूर्ण होती है। सौंदर्य की महत्ता पाश्चात्य साहित्य में भी पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित की गई है। किसी भी वस्तु में सौंदर्य दो तरह से उतपन्न होता है। एक स्वतः उत्पन्न या स्वाभाविक सौंदर्य और दूसरा कला द्वारा उत्पन्न सौंदर्य या कृत्रिम सौंदर्य। नैसर्गिक सौंदर्य सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और इसीलिए प्रत्येक कलाकार अपनी कला द्वारा निर्मित कृत्रिम सौंदर्य के सदृश्य बनाने का प्रयास करता है। और इसमें कलाकार को जितनी सफलता मिलती है उतनी ही उसकी महत्ता प्रतिष्ठित होती है। छायावादी कवियों ने सौंदर्य का निर्माण मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में किया है। एक प्रकृति का सौंदर्य , दूसरा नारी का सौंदर्य और तीसरा शब्दों का सौंदर्य।

छायावादी कवियों की प्रमुख प्रवृति प्रकृति में लगी है। जहां उन्हें समाज में कृत्रिमता, कुरूपता, ईष्या, द्वेष आदि के दर्शन होते हैं वहां दूसरी तरफ भी प्रकृति से सहानुभूति ग्रहण करती है इसलिए छायावादी कवियों ने पाने पूर्व भावनाओं के सौन्दर्य को प्रकृति पर आरोपित कर दिया है। कभी वे प्रकृति में ईश्वरीय सौंदर्य का दर्शन करते हैं , तो कभी अपनी प्रियतमा का प्रतिरूप भी प्रकृति में ही प्रतिबिंबित पाते हैं। उसी चरम छायावादी क्वियीं ने प्रकृति का अत्यंत ही सुंदर कोमल एवं मधुर रूपों को चित्रित किया है। प्रसाद जी छायावाद के प्रतिनिधि कवि हैं। फलस्वरूप इन्होंने भी प्रकृति का सरस कोमल एवं सुंदर रूप उपस्थित किया है। अपने देश के नैसर्गिक प्रकृति का चित्रण करते हुए कवि ने कहा है-

'अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुँचे अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा'

प्रसाद जी की ' विती विभावरी जाग री' कविता उनके प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। वे प्रकृति के अनेक कोमल उपमानों का प्रयोग अपने साहित्य के विविध अंगों को सजाने के लिए किए है। कहीं- कहीं उनकी प्रकृति उग्र रूप अवश्य दृष्टिगत होता हैबकिन्तु वे सभी प्रसंग निर्माण के निमित उपस्थित हुए है। प्रसाद जी ने प्राकृतिक सौन्दर्य पर करुणा का आरोप किया है। इस आरोप में एक तरफ उन्होंने प्रकृति का कोमल रूप उपस्थित किया है तो दूसरी तरफ करुण रूप भी दृष्टिगत होता है।

छायावादी कवियों के सौंदर्य चित्रण का दूसरा क्षेत्र नारी सौंदर्य है। छायावादी कवियों की नारी सामाजिक जीवन की स्थूल, मांसल नारी नहीं है वह तो सूक्ष्म भावनाओं का सूक्ष्म आलेखन भाल है। प्रसाद जी की नारी स्वयं कहती है-

तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की वात रे मन

और इसलिए छायावादी कवियों ने रीतिकालीन वासना से ग्रस्त नारियों के रूप का परिष्कार कर उन्हें माता, देवी, माँ, सहचरी, प्राण सचिन सीता के स्थान पर आधिष्ठित किया है। प्रसाद को शब्दों में-

'नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पल तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो
जीवन की सुंदर समतल में।'

नारी सौंदर्य की यह पीयूष स्रोत उनके सम्पूर्ण साहित्य में प्रवाहित हुआ है। नारी सौंदर्य के चित्रण में प्रसाद ने अपने को एक ऐसे रूप में उपस्थित किया कि जो सौंदर्य के सूक्ष्मातिसूक्ष अवयवों का परिपूर्ण है। प्रसाद के सौंदर्य में अथाह गांभीर्य है। उसमें उपभोग की गंभीरता सर्वत्र दृष्टिगत होती है किंतु कहीं भी वासना की अधमरी गागरी छलकने नहीं पायी है।

प्रसाद ने सौंदर्य को परखा है उसका उपभोग किया है, उसकी स्वाभाविक अभिलक्षित भी की है। प्रसाद ने अपने 'आँसू' काव्य में नारी का नख-शिख वर्णन किया है-

"बाँधा था विधु को किसने
इन काली जंजीरों से
मणि वाले फणियों का मुख
क्यों भरा हुआ हीरों से?
"काली आँखों में कितनी
यौवन के मद की लाली
मानिक मदिरा से भर दी
किसने नीलम की प्याली?"

प्रसाद का यही वर्णन ' कामायनी' में अत्यंत ही प्रौढ़ रूप में उपस्थित हुआ है-

"खिल रहा मृदुल अधखुला अंग
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ बन बीच गुलाबी रंग।"

प्रसाद की सूक्ष्म सौंदर्य दृष्टि उत्तरोत्तर बढ़ती गई है। प्रसाद की वर्णन शैली सौंदर्य को चित्रित करने में अत्यंत ही सफल है। प्रसाद का सौंदर्य उपभोग प्रधान न होकर उद्दात्त सौंदर्य भी है। भारत माता का चित्र उपस्थित करते हुए प्रसाद ने अपने उद्दात्त सौंदर्य दृष्टि का परिचय दिया है-

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से,
प्रबुद्ध शुद्ध भारती।
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला,
स्वतंत्रता पुकारती॥
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ प्रतिज्ञ सोच लो।
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो बढ़े चलो॥

भारत की स्वतंत्रता भारत माता की स्वतन्त्रता है और भारतीय आत्मा के प्रबल पारखी प्रसाद भी स्वयं है।

शब्द सौंदर्य-

सौंदर्य निर्माण की दृष्टि से छायावादी कवियों की सीमाएं शब्द योजना में दृष्टिगत होती है। छायावादी कवियों ने अप्रस्तुत विधान कोमल कांत पदावली के द्वारा सौंदर्य निर्माण की चेष्टा की है। प्रसाद जी का सम्पूर्ण काव्य इसका उदाहरण है। शब्द योजना में विप्सा अलंकार, ध्वन्यात्मक शब्द, अनुकरण वाचक शब्द आदि की आवश्यकता सर्वाधिक है। प्रसाद के निम्नलिखित उदाहरण में भाषागत सौंदर्य को सारी विशेषताएं परिलक्षित होती है-

"खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा
लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी।"

-- संतोष पटेल , नई दिल्ली