क्रोध की चिनगारी...!


मन में आग जो लगे,

        क्रोध ही अग्नि समान।
क्रोध धधकती कोयला जले,
        जल गये लोग अनजान।
आग ज्वाला भीतर मन,
        सोखे सागर करुणा प्रेम।
प्रकट करे हिंसा रूप,
          विकट ज्ञानी अक्षेम।
चक्रव्यूह में फंसता था,
      जीवन का ताने बुनता था।
स्वयं आग की लपटों में,
          जलता मन अज्ञानता था।
अन्तःकरण मध्य चित्त,
              ज्ञानचक्षु उज़ागर हो।
छोटी छोटी बहती नदियाँ,
          मिल जाये तब सागर हो।
गुरु मिले जो तार दे जीवन,
          ज्योतिपुंज ब्रम्हानंद हो।
क्रोध घुट में निगल जाये,
          आनन्द से परमानन्द हो।
प्रकाश करता अंधेरे को ,
          जले जो दीपक समान।
अंदर अदृश्य रूप में,
      क्रोधी ज्वाला से अनजान।
क्रोध का कोई रूप नही,
            जग में न आकार।
क्रोध से कोई न बचे,
            शुद्ध न होता विचार।
चिनगारी जो आग लगे,
          करे वहाँ को राख।
क्रोध अग्नि जहाँ जगे,
      मिल जाये फिर ख़ाक।
प्रथम मन पर असर,
          दूजे तन पर वार।
धन की दुर्गति क्या कहे,
        बचे न कही फिर सार।
क्रोध की चिनगारी को,
        हवन कुण्ड में डाल।
शान्ति शांखला आहुति,
        बिछे न कही फिर जाल।

              दिव्यानंद पटेल
              विद्युत नगर दर्री
              कोरबा छत्तीसगढ़