वक्त का पहरा


घड़ी चल रही है पल पल वहीं 

दिन ढल रहा है पग-पग वहीं,
न जाने ये कैसी पहेली जगी
अजब जिंदगी की पहेली जगी ,
न जाने कोई कल की गुजरा कहीं
न ठहरा कोई पल जो गुजरा वहीं ,
अजब कशमकश की ये घड़ियां बड़ी,
नहीं जिंदगी का है पहरा कोई,
न सोचा न समझा न जाना कोई
कि गुजरा है कल कैसा न माना कोई,
दिन ढल रहा है पल पल वहीं
निशां में है डूबी निशाएं वहीं ,
जो ठहरा यहीं है वो जाना यहीं,
यही जिंदगी को है कहता कवि ,
अजब जिंदगीं का न पहरा कोई ,
लगी धुन है कैसी न चेहरा कोई,
गजब जिंदगी का न पहरा कोई,
जो सोचा था समझा था जाना वही
घड़ी चल रही थी पल-पल वहीं ।

कवि कुमार प्रिंस रस्तोगी...
लखनऊ, उत्तर प्रदेश...