जुनूने इश्क़ से दूर रहूँ,.


वो मिलायें नज़रें तो ,

उन्हें बेक़रार करूं ,
वल्लाह कसम से उन्हें ,
बेइख्तियार करूं ,
तुम जो कह दो तो,
जुनुने इश्क़ से दूर रहुँ ,
दें इजाज़त तो दिल को ,
अपने तार तार करूं ,
तेरी आंखो को जो देखूं,
तो नशा आ जाए ,
फ़िर क्यों साक़िया से ,
मैं युं ही प्यार करूं ,
ऐसे रूठो न बुरा तुम ,
मेरे सनम अब मानो ,
एक इशारा तो करो,
खुद को तुम पे निसार करूं ,
उनको कहते हो माहताब ,
जो तुम मुश्ताक ,,
दाग़ को उनके फिर ,
कैसे अब शुमार करूं ,

डाँ . मुश्ताक़ अहमद शाह
" सहज़"
मध्यप्रदेश