किसान का झूठ


किसान भाई!

झूठ कहते हो

कि बदहाल हो तुम,

' सरकारी विज्ञापनों ' में देखा है हमनें

कि कितने ' खुशहाल ' हो तुम।

किसान भाई!

झूठ कहते हो

कि सरकारों ने तुम्हारे बारे में कभी 

सोचा नहीं है,

' सरकारी योजनाओं ' में देखा है हमनें

कि कितना ' फायदा ' उठाए हो तुम।

किसान भाई!

झूठ कहते हो

कि गरीबी से तुम्हारा पिंड नहीं छूटा

है अब तक,

' समाचारों ' में खूब देखा है हमनें

कि कितने ' पिज्जा ' खाए हो तुम।

किसान भाई!

झूठ कहते हो

कि इस देश के अन्नदाता और अर्थव्यवस्था की

रीढ़ हो तुम,

नेताओं के भाषणों में ' सच ' सुना है हमनें

कि ' देशद्रोही विचारधारा ' से

प्रेरित हो तुम।

जितेन्द्र ' कबीर '

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