भारतीय संविधान समाज के कमजोर व जरूरतमंदों को निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करता है: श्रीमती सुमिता


सहारनपुर। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव/न्यायिक अधिकारी(वरिष्ठ) श्रीमती सुमिता ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए समाज के कमजोर व जरूरतमंदो को निःशुल्क विधिक सहायता देने की वचनबद्धता सरकार के उपर डालता है। उन्होंने कहा कि इस वचनवद्धता को पूरा करने के लिए 1987 में यह विधिक सहायता अधिनियम कानून बना जिसके अनुच्छेद 12 में बच्चो, महिलाओ, अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग, बुर्जगो को हक है कि न्याय की आस में आर्थिक मजबूरी की वजह से वे पीछे न हठे बल्कि वे न्याय प्राप्ति में सफल हो सके।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष/जनपद न्यायाधीश श्री सर्वेश कुमार के मार्गदर्शन में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्राप्त निर्देशों के क्रम में आज सचिव/न्यायिक अधिकारी(वरिष्ठ) श्रीमती सुमिता जागरूकता शिविर को समबोधित कर रही थी। उन्होंने कहा कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सहारनपुर न्याय प्राप्ति में सफलता के लिए सभी को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराता है। कोई भी आमजन जो धारा 12 के तहत लाभार्थी है, वह जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यालय में आवेदन/दूरभाष से सूचित करके निःशुल्क अधिवक्ता की सहायता प्राप्त कर सकता है। 

सचिव/न्यायिक अधिकारी(वरिष्ठ) श्रीमती सुमिता ने कहा कि मुकदमों की बढती संख्या को कम करने के मकसद से मध्यस्थता की प्रकिया अपनायी जाती है। जिसके पक्षकार अपने वैवाहिक, पारिवारिक मुकदमों को सुलह के आधार पर निपटारा करवा सकते है। महिला अपने कार्य स्थल पर सुरक्षित रहे इसके मकसद से 2013 मेें एक कानून लाया गया जिसमें महिलायें अपने लैंगिक अपराधो से संबधित शिकायत में दर्ज करा सकती है।  उन्होंने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम महिलाओं को हर प्रकार की हिंसा से संरक्षित करता है। अनुसूचित जाति जनजाति एक्ट 1989 समाज को यह संदेश देता है कि असमानता, भेदभाव को छोडना होगा सभी कानून की दृष्टि में समान है। हम सब पहले इंसान है इंसानियत ही हमारा धर्म है। सभी से अपेक्षा है कि जागरूक रहिये, इंसान की ओर निरंतर कदम बढाइये तभी एक संतुलित समाज की परिकल्पना साकार होगी।