अजनबी


कभी लगता है 

अजनबी हो
कभी बहुत अपने से
कभी दूर कभी पास
कभी बिल्कुल सपने से...

इश्क़ मुहब्बत जिस्म रूह
न, न, कुछ नहीं मानती
ज़िंदगी तिलिस्म है
या फिर वही वहीं
बिल्कुल वैसी ही
जैसी सोची थी, नहीं जानती...

बस पानी की धार में
भावों की पतवार से
जीवन की नाव में डोलती
तुमसे भरसक टकरा जाती हूं
और फिर...

कभी लगता है अजनबी हो
पर कभी बहुत अपने से
बन्द आंखों के ख़्वाब नहीं
बस खुली आंखों के सपने से।

    - अनुपमा सरकार
        नई दिल्ली