लकड़ियाँ


कोई ढूंढ रहा

मसलों की लकड़ियाँ

सेकने की राजनितिक रोटियां

कोई ढूंढ रहा

ज़िन्दगी की लकड़ियाँ

जीने को फुटपाथ , 

झोपडी की बेबसी

कोई ढूंढ रहा

साथ की लकड़ियाँ

बनाने को बुढ़ापे का सहारा

कोई ढूंढ रहा

प्रेम की लकड़ियाँ

लाने को गर्माहट सर्द रिश्तों में

पड़ी यूँ सर्द मौसम की

यूँ मार ऐसी

किसी को निज स्वार्थ

की लकड़ियाँ

किसी को अपनेपन

की लकड़ियाँ

किसी को जीवित रहने

की लकड़ियाँ

किसी को चूल्हा जलाने

की लकड़ियाँ

हर किसी को है चाहत

सर्द मौसम की मार में

अपनेपन से भरे जीवन

को जीने की 

चाहत और एहसास की 

लकड़ियाँ......,।।

..मीनाक्षी सुकुमारन

  नोएडा