गजल के दीवाने दुष्यंत कुमार


मैंने बहुत शायरो को पढ़ा पर मेरे दिल में सबसे ज्यादा उथल -पुथल जिनको पढ़कर हुई वह दुष्यन्त कुमार ही हैं आज उनकी पुण्यतिथि पर नम आँखों से श्रधांजलि देते हुए चन्द पंक्ति उनके बारे में।


दुष्यन्त कुमार ,अपने शब्दों से क्रांति की आग में घी की आहुति देने वाले शायर जो कभी साहित्यिक चारदीवारी में बंध के शायरी नही की बल्कि हमेशा उससे बाहर निकल, आमजनों की भाषा मे शायरी की । उस भाषा मे बोला जिसमें पूरा हिंदुस्तान बोलता हैं । शायद यही बात उनको सबसे अलग बनाती हैं और सहित्यकारों की भीड़ में उन्हें एक अलग स्थान दिलाती हैं उनकी ग़ज़लों की ताकत का अंदाजा इसी से लगया जा सकता हैं कि जब भारत आजाद भारत के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था पूरा देश इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये से चीख रहा था और देश में एक बूढ़ा आदमी अपने कमजोर हो गए पैरो को संभाल सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल फुका तो दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों ने नारो का रूप ले लिया ।

"हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए"

तत्कालीन इन्दिरा गांधी की सरकार के ख़िलाफ़ इस क्राँति को चीख़ने को आवाज़ दी। एक दिलचस्प बात यह भी हैं कि दुष्यन्त जी जब सरकार के ख़िलाफ़ लिख रहे थे तब वे खुद मध्यप्रदेश सरकार में एक सरकारी ओहदे पर आसीन थे ।सरकारी तंत्र में रहते हुए भी अपने अंदर सरकार के ख़िलाफ़ दबी हुई चिंगारी को कभी बुझने नही दिया और हमेशा ही अपने कलम को हथियार बना सरकार विरोधी ग़ज़ल लिखतें रहे ।यह उस वक्त का दौर था जब बड़े से बड़े ओहदे वाला आदमी भी इंदिरा गांधी के खिलाफ़ एक शब्द बोलने में कापता था तब एक लेखक लगातार उनपर प्रहार करता रहा ।

"एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है। "

दुष्यन्त सिर्फ आग उगलने वाले शायर ही नही थे ,मैं देखता हूँ अगर वो सरकार के ख़िलाफ़ नही लखते तो दुनिया के साहित्य प्रेमिओ को एक प्रेम का धाकड़ शायर मिलता जो उनकी शायरी में साफ झलकता हैं।

"मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ "

आज दुष्यन्त को इस दुनिया से गये हुए 40 वर्ष से अधिक समय हो गया परन्तु उनकी ग़ज़ल के दीवाने आज भी हर शहर ,हर गली और हर कॉलेज के सीढ़ियों पर बैठे उनकी ग़ज़लों को गुनगुनाते मिल जाएंगे ।

-- प्रेम विशाल
छपरा , बिहार