एक नज़्म


मेरी आँखों से 

अश्कों के चंद कतरे
जब कभी निकलते हैं
बिखरने की कोशिश तो करते हैं
पर उन्हें सहेज लेता हूँ
नीचे नहीं गिरने देता
मेरे दोस्त यार इसे बेशक़
मेरी फनकारी कहते हैं
मैं कई बार खुद से पूछता हूँ
क्या मैं इतना बड़ा फ़नकार हूँ
ज़बाब यकीनन नहीं ही मिलता है
तो जो दूसरों को फ़नकारी लगती है
वह आखिर है क्या?
सच कहूँ तो यह मेरी आँखों में पसरा
तवील सन्नाटा है
बहुत सारी टूटी हुई गांठें हैं
एक सूखा हुआ दरिया है
रोजमर्रा के सैंकड़ो
अनसुलझे हुए मसले हैं
मुंतशिर यादों की परतें हैं
ख्वाहिशों की लम्बी फेहरिश्त है
कुछ देर पहले ही बुझी
आग की तपिश है
रिश्तों के बिखरे हुए टुकड़े हैं
मोहब्बत के भूले हुए अशआरों की
कुछ आड़ी तिरछी रेखाएँ हैं
गूंगी खामोशियों की सदाएं हैं
ऐसे में भला अश्कों की क्या बिसात
बेचारे ढलक ही नहीं पाते
उलझ कर रह जाते हैं एक चक्रव्यूह में
और उन्होनें सीखा ही कब
इन प्रतिकूल परिस्थितियों का
जम कर मुक़ाबला करना
ज़ाहिर है उनके पास
कोई और विकल्प तो है ही नहीं
बेचारे मजबूर करें भी तो क्या
उनकी असमर्थता
मेरी फनकारी कहलाती है
जिसे मैं स्वीकार कर लेता हूँ
कितना दिलचस्प है ना
एहसासों की खुदकशी का यह खेल

राजेश कुमार सिन्हा
मुम्बई