ठंड की कहर..!


डुबकियाँ ख़ूब लगाते,

        सिक्के गिर जाये पानी में।
अब तो एक बूंद पानी से,
      नया मोड़ आया कहानी में।
सूरज भी सहमे सहमे सा,
            हिलोर मचाती देखो मन।
धूप से जिसने नाता तोड़ा,
              कंपकपाती ठंड से तन।
  कैसा आया ऋतु परिवर्तन,
            खेलते देखा धूप के संग।
  छाया की आशा में हरदम,
          मौसम बदला कैसा ये रंग।
बलवान का गूगुर टूटता,
            समझौता की शमशीर।
घुटने सबको टिका ही देता,
            कैसे बचाये अब शरीर।
बह रही हवाई सर्द,
            टूट पड़ा ठंड की कहर,
ओले अम्बरतल में बरसे,
          नदियाँ पर्वत गाँव शहर।
आग की चिंगारी ढूंढता,
    बेचैन कथिक मन व्याकुलता।
ठौर से निज दिन निकल गये,
        पग वापसी को आतुरता।
सलामी देता सूरज आने की,
      कोहरा आसमाँ की उस पार।
संध्या काल विदाई संग,
      निशा के हरदम जाड़ा यार।
अब कौन समझाये उनको,    
          सूरज रात में कैसे उगता।
एक रात भी वह न रूकता।
        कैसे बचाये ठंड से भीगता।
कोहरे की तांडव को देखा,
      धरती पर नाच रही हो जैसा।
तन भी कपकपाती मानो,
        संग संग नाच रहा हो वैसा।
मोती बन बरस पड़ी,
          बून्दो में ओसे की लहर।
सर्दी सिमट कर श्रृंगार,
          टूटा बनकर तन में कहर।
आनंद ये ठंड का मेला,
          क्षण न एक पल गवां।
ठंडी हवा वही सुदाई,
        कौन बच्चे तो कौन जवां।
आया जग में रोकर आया,
        जाएगा भी जग रुलाकर।
सुख दुःख का कुंभ यहाँ,
          दो पल जी गम भुलाकर।

            दिव्यानंद पटेल
            विद्युत नगर दर्री
            कोरबा छत्तीसगढ़