साधक और मंदिर ( “सिंहनाद" विचार वीथि )


रचना कर्म एक साधना है और रचनाकार एक साधक ; यहाँ वहाँ बनी हुई साहित्यिक संस्थाएँ साहित्य का मंदिर हैं । नागरी प्रचारिणी सभा से लेकर वर्तमान में प्रचलित अनेकानेक मंदिर बनाएँ साधकों ने । कुछ पूर जोर चल रही हैं कुछ लुप्त हो गई हैं या यूँ कहें कपाट बंद हो गए मंदिर के भगवान तो अब भी विराजते है बस साधक नहीं आते । साधकों का संबंध सीधा साहित्य से होता है न कि साहित्य मंदिर के द्वार बैठे पुजारी से । साधक अपने ईश्वर को किस तरह पूजता है मनाता है , यह उसकी पूजन विधि है । मैं नें एक प्रासंगिक कथा सुनी इस संदर्भ में एक भक्त रोज भगवान को गाली देने मंदिर आता , यहाँ तक की तीन जूते नियमित मारता । यह देख पुजारी बहुत चिढ़ता । एक बार जोरों की बारिश हुई । आवागमन ठप । पुजारी पूजा करने न जा सका मगर वो जूते मारने वाला आ पहुँचा । और लगाए तीन पानी से लथपथ ....। 

आगे की कथा आप जानते ही हो । भगवान ने पुजारी को दर्शन नहीं दिए कभी मगर उस जूतेवाले भक्त को दिए । क्यों ..? 

क्योंकि पुजारी पूजा के बदले दक्षिणा , प्रसादादि लेता था मतलब व्यापार करता था । और व्यापारियों पर कब भगवत कृपा होती है। यह तो माँ मीराँ के लिए आरक्षित है ।

 मंदिर निर्माता धर्मात्मा  ये समझे कि मंदिर मैंनें बनवाया मैं जब चाहे इस पर ताला लगा दूँ  ! क्या यह संभव है ? नहीं । एक बार ईश्वर को सौंपे हुआ पाषाण पर मूर्तिकार का कोई अधिकार नहीं है अब उसमें दिव्य शक्ति का वास हो गया है । अब उसे तो भक्तों के हवाले करने में ही भलाई है । 

एक बात और मंदिर में कौन सेवा करने आता है ? 

कितनी देर सेवा करके जाता है ? 

किस विधि से करता है ? 

यह सब हिसाब रखने का पुजारी को क्या अधिकार है ? 

माना आपका मंदिर अति प्रतिष्ठित है तो इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं बनता कि आप सेवकों पर या साधकों के पाँव बेड़ियाँ डाल दे । यह तो अनुबंध है उस मूरत का हृदय मूरत से ; जब तक है भक्त जमा रहेगा । जब मन उचट गया किसी और मंदिर की सुध लेगा । अब आप कहेंगे यह तो गलत है , वह उठकर कैसे जा सकता है , हमारा मंदिर तो बहुत प्रसिद्ध है । भगवान उसे पाप देंगे । 

भाई आप हो  कौन चीज यह सब तय करने वाले ? उसे भगौड़ा , अभक्त ढ़ौंगी आदि संज्ञाओं से नवाजने वाले । आपकी प्रतिष्ठा तो तब मानी जाती जब जात्री / जाने वाला जाने के बाद भी आपकी आव भगत से प्रसन्न रहता ।   भक्त से बड़ा भगवान है । यह सत्य है अगर सच्चे  भक्त ही ना हो मंदिर और भगवान का क्या ...। 

वैसे भी जोगी तो रमता ही अच्छा । पानी तो बहता ही अच्छा । यदि वो कुछ देर  आपके यहाँ  ठहर गया तो यह सौभाग्य ही हुआ आपका मेरी समझ में  । जैसे आते समय आप प्रसन्न हुए थे उसी तरह जाते समय उसकी सेवा और छवि का मूल्य श्रद्धावनत होकर उसे विदा करने में ही है । उसे गाली देने या भगोड़ा कहने में नहीं कि यह आया था , लेकर चला गया । आपका क्या है जो वह लेकर चला गया वह तो उसकी सामर्थ्य है जो वो ले  गया ।  आप तो यहाँ नियमित रहते हैं आप भी ले लीजिए , मैं तो कहता हूँ जमकर लूटिए । भगवत् कृपा का यह आगार कभी कम नहीं होगा । मगर यूँ शोर मचा कर , साधक को बदनाम करके आपकी सिद्धि सिद्ध नहीं हो जाएगी । 

मान लीजिए सत्संग हो रहा है भीड़ आ रही है , जा रही है । कोई पूरा सत्संग बैठता है । कोई कुछ घड़ी । कोई बार - बार दीर्घ शंका को जाता है । मगर क्या इस सबका प्रभाव उस सत्संग मंड़ली पर पड़ता है ? क्या वो उठकर जाने वाले को भगौड़ा कहते हैं ? जाने के बाद सत्संग छोड़कर उनकी बुराई करते हैं ? या रमे रहते है भगवत् भजन में ।  

एक और उदाहरण वैतरणी का देना चाहूँगा फिर निष्कर्ष पर चलेंगे । मुझे साहित्य माँ गंगा की तरह पवित्र और प्रवाहमान प्रतीत होता है । जिसके तट कितने ही प्यासे आते हैं , प्यास बुझाते हैं ; लौट जाते है । वो कौन जात है ? किस वर्ण है ? कौन क्षेत्र से आए हैं ? जो आए हैं  कुछ छोटे बर्तन में  गंगाजल भरकर ले जाते हैं । कुछ अति उत्साही बड़े बर्तन भरते हैं। कुछ तो तट पर ही जम जाते हैं , डेरा डाले ।  बताईए यह सब क्या है ? 

मेरी दृष्टि में यह सब माँ गंगा की कृपा है और साथ ही साधक की साधना पद्धति । इसे  आकर्षण कह सकते हैं , गंगा का जादू कह सकते हैं , प्रभाव भी कह सकते हैं । कि वह किसे कितनी देर अपने सानिध्य में रखती है । 

तट को क्या हक है आने - जाने वालों के कदम गिनने का । उसका तो मौन रहना ही अच्छा है । क्योंकि उसे तो माँ गंगा सदैव अपनी धारा से पवित्र करती रहती है । 

निष्कर्ष यह है कि जो भी मंदिर बने हैं वो साधकों के लिए ही हैं वो जब चाहे जिस मंदिर में आ - जा सकते हैं । कुछ जोगी तो इतने उत्साही होते हैं कि कहीं पाँव जमाते ही नहीं । उन्हें तो पूरे घर देखने हैं भगवान के । देखने तो यह भी साधना का एक तरीका ही हुआ । बहुत मंथन के बाद यह सब लिख पाया । यदि आप भी कोई मंदिर बनाओ / बनाया है , या पुजारी बनो तो निस्वार्थ बनना । आने जाने वालों की गिनती मत कर बैठना / संख्याँ के फेर में मत पड़ना वरना एक लोभ मन में घर कर जाएगा कि आज कम आए कल ज्यादा थे ! आदि आदि । 

आते का स्वागत करना , रहते का सत्कार और जाते को सहर्ष विदा । क्योंकि इसी में आपकी गरिमा है । हो सकता है आपके सेवा भाव से द्रवित कोई भक्त पुन: लौटकर आ जाए मंदिर में । और कौन कहे भगवान स्वयं आए हों भक्त के रूप में । यदि आपने इन्हें ठुकरा दिया तो बड़ा नुकसान झेलोगे । क्योंकि चातक को सदैव सावधान रहना चाहिए कब स्वाति आ टपके । इसी में दोनों का अस्तित्व सुरक्षित है । वरना कोई किस पर लांछन का कीचड़ फेंकेगा ,कोई किस पर मगर दोनों सूरतों में कीचड़ मंदिर के आसपास ही गिरेगा । 

ये मेरे विचार मात्र हैं ; इन्हें किसी व्यक्ति विशेष या संस्था से न जोड़ा जाए । 

सादर आभार । 


© मनोज कुमार  “सिंहनाद”

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