आखिर क्या है प्रेम


प्रेम जितना छोटा उतना ही अपार है प्रेम का अर्थ करना अलग बात है पर प्रेम का अनुभव होना अलग बात है प्रेम की व्याख्या करना तो सरल है पर किसी के प्रेम में डूब कर कर्तव्यों का निर्वाहन कठिन है भावभीनी शब्दों से प्रेम के ऊपर समा बांधना आसान है परंतु प्रेम में आकंठ हृदय की वेदना को उजागर करना सरल नहीं है दूसरों को प्रेम के बारे में बताने वाले प्रेम की व्याख्या करने वाले स्वयं कितना भावना भरा हृदय रखते हैं यह अलग बात है।

      क्योंकि प्रेम की व्याख्या सरल है प्रेम में जीना कठिन है प्रेम करना जितना सरल है उसे निभा पाना उतना ही कठिन है प्रेम नदी का उथला पानी नहीं है।
की रे त नजर आए प्रेम समुद्र की गहराइयों में छुपा वह मोती है जिसे प्राप्त करने के लिए प्रेम रूपी समुद्र में डूबना पड़ता है।
बिना किसी चाहत के प्रेम को बताना सरल है परंतु बंद अधरोके पीछे छुपे प्रेम को जीना आसान नहीं है।
      प्रेम मनुष्य जीवन की सबसे ज्यादा सुंदर व कोमल भावना है जो अतिंद्रीय सुख है अर्थात देश सुख से परे प्रेम इंद्रिय सुख है प्रेम मन की कल्पना से अलग देशकाल की सीमाओं से परे है।सही मायने में प्रेम में देशकाल जाति धर्म आदि का प्रभाव नहीं होता है प्रेम वह मजबूरी होती है कि स्वयं को नष्ट कर प्रेमी की चाहत ही सर्वोपरि होती है प्रेम शाश्वत है यह कभी नष्ट नहीं होता है और जो नष्ट हो जाए वह प्रेम नहीं हो सकता है लेकिन यहां यह प्रश्न उठता है कि नष्ट होने वाले संसार में प्रेम शाश्वत कैसे हो सकता है और क्या शाश्वत प्रेम इस मरण धर्मा सृष्टि में है या फिर यह कोई परिकल्पना है आखिर क्या है प्रेम?
    प्रेम है किसी को इतना चाहना की अपने अस्तित्व को तोड़कर उसके अस्तित्व में ही अपनी हर ख्वाहिश का रंग घुलता मिलता महसूस हो अपने सुखों को नष्ट कर एक दूसरे में खुद को खो देना है प्रेम ।प्रेम में बीजकी तरह स्वयं को बोना है फिर स्वयं के उगते हुए प्रेम रूपी पौधे को निहारना अपने अस्तित्व में अंकुरण का एहसास जो स्वयं को मिटा कर किया गया हो प्रेम अस्तित्व का मर्म है धुरी है जिस पर प्रेम टिकता है आधार पता है प्रेम न तो मन में समा ता है ।
और ना ही देहउसे धारण कर सकती है प्रेम कारण शरीर का सर्वोच्च सौंदर्य है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है बताया नहीं।
          और जिसे हम प्रेम समझते हैं वास्तविकता में विषय है जो संसार में व्याप्त है और यह विषय इंद्रियों का है इंद्रियां इस विषय को ग्रहण करती है उसे धारण करती है उन्हें सवेंदितकरती है जिससे इंद्रियां उद्दीप्त वउत्तेजित होती है क्योंकि यह हमारी देहमें रची बसी होती है क्योंकि देह का होना इन्हीं के द्वारा संभव है अपने क्रियाकलाप देह इन्हीं के सहयोग से चलाती है इसीलिए देहको इंद्रियों का संजाल कहा जाता है और प्रेम का स्थूल शरीर से कोई मतलब नहीं है यह तो शरीर से आगे कारण शरीर का मर्म बिंदु है तो प्रेम शरीर से संभव नहीं है प्रेम मन से भी परे की चीज है।
        प्रेम दैहिक नहीं होता है और जो प्रेम देहसे होता है वह प्रेम नहीं होता है बस इंद्रियों का मोह जाल है जो वासना होती है। यह भी सच है कि वासना का रूपांतरण प्रेम में होता है परंतु जब वासना प्रेम में परिवर्तित हो जाती है तब वह शरीर मात्र का नहीं रहता है आत्मा से जुड़ जाता है।
  प्रेम तपते मरुस्थल में बूंद के समान है जो सिर्फ अध्यात्म जगत का है और वासना संसार की है वासना पंकहै मगर उस पंक में खिलने वाले पंकज के समान प्रेम है जो खिलता पंकमें है परंतु उसके रहस्यों का विश्लेषण नहीं हो सकता है।
प्रेम तत्व जहां है वहां स्वयं परमात्मा का निवास होता है या फिर वह मसीहा होंगे जो इस संसार के होकर भी संसार के नहीं होंगे वहां असली प्रेम होगा प्रेम, प्रेम होता है और कुछ नहीं परंतु प्रेम के स्थान पर कुछ विसंगतियां उत्पन्न हो जाती है जिसे भी प्रेम मान लिया जाता है जिसमें भावना के स्थान पर भावुकता की बाढ़ रहती है भावना में समंदर की लहरों के समान उतार-चढ़ाव होता है इसलिए जिसे हम चाहते है या तो उसे भगवान का दर्जा देते हैं और उसकी पूजा एवं स्तुति करते हैं और उसे ही देखना पसंद करते हैं सामने वाला पहले जैसा ही होता है हम ही अपनी भावनाएं उस पर आरोपित कर उसे भगवान बना देते हैं। और यह केवल कोरी भावुकता का परिणाम है जो सिर्फ व्यक्तित्व से प्रभावित होने के कारण आती है या उससे आपका जुड़ाव हो जाता है क्योंकि वह आपकी परेशानियों को हल करता है परंतु यह प्रेम नहीं सिर्फ उसके प्रति श्रद्धा या सम्मान का भाव होता है जिसे अनजाने में प्रेम मान लिया जाता है।
  प्रेम का एक रूप और है और वह है एक तरफा प्रेम जिसमें एक ही तरफ से प्रेम होता है कभी-कभी यह प्रेम शांत भाव से बहता रहता है लेकिन यह एकतरफा प्रेम कभी-कभी विध्वंस कारी भी हो जाता है अतः ऐसे प्रेम से बचना चाहिए क्योंकि प्रेम दो के बीच एक होने का भाव होता है और एक तरफा प्रेम में यह संभव नहीं है।
    ' स्यूडों प्रेम'प्रेम का एक अन्य रूप है जो भावुकता वादी प्रेम है इसमें प्रेम को केवल कल्पना में ही अनुभव किया जाता है कल्पना की अधिकता के कारण वास्तविकता और व्यावहारिकता उपेक्षित होती है जिसे चाहते हैं उसके कल्पना करने में प्रसन्नता पाते हैं और कल्पनाओं में ही व्यक्ति अपने प्रेम को तृप्त करता है।
  प्रेम करुणा का शिखर है इसमें डूब ना ही प्रेम है जैसे पानी दूध में मिलकर दूध बन जाता है और आग की तपिश में पहले पानी जलता है एक बार प्रेम में खोने के बाद व्यक्ति को प्रेम के सिवा कुछ नजर नहीं आता है क्योंकि प्रेम बस प्रेम प्रेम प्रेम होता है।

कवयित्री गरिमा राकेश गौतम
कोटा राजस्थान