21वीं शताब्दी में भी बिजली, पानी व सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित देवीपुर गांव


सीतापुर। जिला मुख्यालय से मात्र तीस किलोमीटर व राजधानी लखनऊ से मात्र 50 किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे के किनारे स्थित देवीपुर गांव बिजली पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। वहीं प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार तक ग्रामीण इलाकों की उद्धार के लिए न जाने कितनी योजनाएं संचालित कर रही हैं। ये योजनाएं जरूरतमन्दों तक न  पहुंचकर रसूखदारों अथवा अफ सरशाही रहनुमाओं की लापरवाही से लोगों तक नहीं पहुँच पाती है। आज हम आपको क्षेत्र के एक ग्राम पंचायत के मजरा देवीपुर में लेकर चलते हैं। 

जहाँ पर लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। आजादी की 73 वर्ष बाद भी इस कसमंडा विकासखण्ड का सुरैचा ग्राम पंचायत का यह मजरा देवीपुर अभी भी सन 1947 वाली जिंदगी जीने को मजबूर है। ढिबरी की रोशनी में बच्चों कों पढाई करनी पड़ती है गर्मी हो या सर्दी अंधेरे में ही लोगों के घर में खाना बनता है और लोग लैम्प अथवा ढिबरी अथवा निजी बैटरी के मामूली उजाले में महिलाये खाना खाना बनाती है और लोग अंधेरे में ही खाना खाते हैं। इतना है नहीं इस गांव में जो सरकारी इंडिया मार्का हैण्डपंम्प लगे है उनमें आने वाले पानी को जानवर भी पीना न पसन्द करें। 

उसी पानी को इस गांव के बाशिन्दे बच्चे बूढ़े व महिलाये पीने को मजबूर हैं। गांव के लोगों ने जब गाँव पहुंची मीडिया टीम को हैंडपम्प का पानी निकाल कर दिखाया तो लगा कि यह पानी इंसानों के पीने लायक तो है ही नहीं। हैंडपम्प से निकलने वाला पानी पीले रंग का और पानी से जंग व काले रंग की गंदगी पानी के साथ निकल रही थी।ग्रामवासी 45 वर्षीय नरेश यादव बताते हैं कि जब से होश संभाला है तब से सुनता आ रहा हूं कि जल्दी ही गांव में बिजली होगी। लेकिन हमारी पीढ़ी ने बिना बिजली के ही जैसे तैसे पढ़ाई की और खेती किसानी कर रहे हैं लेकिन अब जैसे लगता है कि हमारे बच्चे भी अंधेरे में ही अपनी शिक्षा पूरी करेंगें। 

जिससे हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा। ये पता नहीं उन्होंने बताया जो भी पिछली सरकारे आयी तब तब उम्मीद जगी कि इस बार गांव के हालात सुधरेंगे। लेकिन गांव के दशा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। नेशनल हाइवे पर होने के बावजूद निकलने वाली की अधिकारी व मंत्री की नजरें इनायत नहीं हुई। जिससे आज में गांव में न बिजली आ पाई और न ही ठीक से सड़के बनी और न पानी की व्यवस्था हो पाई। गांव के ही एक बुजुर्ग श्रीपाल बताते हैं कि बीते कुछ वर्ष पूर्व गांव के कुछ चयनित लोगों को सोलर ऊर्जा वितरित की गई थी व गांव की गलियों में सौर ऊर्जा लगवाई गयी थी। लेकिन अधिकतर वह खराब हो चुकी हैं। 

अथवा सर्दी में पर्याप्त धूम न मिलने के चलते चार्ज नहीं होती। जिससे गलियों में भी अंधेरा रहता है। टूटी फू टी सड़कों पर बुजुर्ग व बच्चे गिरकर घायल हो जाते हैं। रामगुनी कहती है कि एक ओर जहां केंद्र से सरकार डिजिलिटीकरण योजनाओं के चलते लोगों की शिक्षा को डिजिटल बनाने में प्रयत्नशील है। वहीं हमारे गांव में बच्चे अंधेरे में पढने को मजबूर है। बीते वर्ष  कुछ खम्बे गांव के बाहर कुछ बिजली के खम्बे आये थे लेकिन कुछ दिन पड़े रहने के बाद बिजली विभाग के लोग उठा ले गये। 

बीते दिनों कोरोना संक्रमण के दौरान घोषित लोकडाउन के चलते विद्यालयों द्वारा न आनलाइन शिक्षा पर बल दिया गया लेकिन बिजली न होने से लोगों को मोबाइल चार्जिग जैसे मामूली दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जिससे छात्राओं व छात्रों का भविष्य चैपट दिखाई दे रहा है। ग्रहणी गजराज कहती हैं कि यदि बिजली गांव में आ जाये तो खेती करने में भी आसानी हो जाये। खेतों की सिंचाई करने में डीजल आदि में काफ ी धन बर्बाद हो जाता है। बिजली आने से यह खर्च कम हो जाएगा। जिससे किसान दुगनी कमाई कर सकेंगे और घर में भी खुशहाली रहेगी। 

उन्होंने बताया कि लगभग 600 लोगों की आबादी वाले इस गांव के दिन कब बहुरेंगे यह तो ऊपर वाला ही जाने। लेकिन तीन सौ से अधिक वोटरों की कोई कीमत नहीं होती यह जरूर जाहिर होता है। नरेश यादव कहते हैं कि कई जनप्रतिनिधयों ने बिजली लाने सहित गांव के विकास के की वायदे किये। बिजली विभाग के अधिकारियों को लिखित प्रार्थना पत्र भी दिए लेकिन किसी ने भी इस गांव की ओर ध्यान नहीं दिया। 

कक्षा 11 की छात्रा खुशबू कहती हैं कि बिजली न होने से काफी परेशानी होती और आँखों पर भी काफी प्रभाव पड़ता है। मीना देवी श्रीपाल यादव, मनोज भार्गव, महेश भार्गव, अर्जुन भार्गव, रामनाथ यादव, प्रकाश यादव, गजराज यादव, प्रमोद भार्गव, रामऔतार यादव, रामकुमार यादव, संतरी यादव, रोहिणी यादव, सीमा यादव आदि ने पुरजोर स्वर में गांव में विद्युतीकरण करवाने जाने की मांग की है।